प्रशासन ने आयोग के समक्ष तर्क दिया था कि एक ही नाम के दो मरीज होने के कारण पहचान में भ्रम पैदा हुआ, जिसके चलते यह त्रुटि हुई। हालांकि, आयोग ने इस दलील को पूरी तरह खारिज कर कहा कि नाम की समानता मरीज की सुरक्षा में हुई घोर लापरवाही को सही नहीं ठहरा सकती। यह सीधे तौर पर मरीज की पहचान, सर्जिकल साइट मार्किंग और 'डब्ल्यूएचओ सर्जिकल सेफ्टी चेकलिस्ट' जैसे अनिवार्य रोगी सुरक्षा प्रोटोकॉल की विफलता है।
अनिल कुमार मौर्य ने बताया कि आयोग ने इस बात पर भी एतराज जताया कि अस्पताल की आंतरिक जांच समिति का अध्यक्ष उसी टीम के प्रमुख को बनाया गया, जिस पर लापरवाही का आरोप था। आयोग के अनुसार, ऐसी आंतरिक जांच निष्पक्ष नहीं हो सकती। साथ ही, पूर्व में दिए गए निर्देशों के बावजूद वाराणसी के मुख्य चिकित्सा अधिकारी (सीएमओ) द्वारा रिपोर्ट न सौंपे जाने को भी गंभीरता से लिया गया।