उनसे विदा लेकर हम घाट की सीढ़ियां उतरते हैं और उधर सुभाष बाबू... पोराला, पोरीला, आईला, बड़ेला... कुठे देश कुठे काशी... घ्या गंगा ला काकुनद्या (मां बाप व बाल बच्चों के निमित्त दीपदान करें) की मराठी हांक के साथ मुंबई से काशी आए मछुआरिनों के दल को धर लेते हैं।
सुभाष साहनी की चौकी से महज पांच सीढ़ी नीचे तीर्थ पुरोहित तिवारी जी महाराज का आसन है । पंडितजी भी दर्जा पांच से आगे नहीं पढ़ पाए हैं, मगर ज्ञान के नाम पर यह भी पांच भाषाओं पर अच्छी पकड़ रखते हैं। फिलहाल वह गुरु खर्रा तेलुगू में अम्मा इदू दशाश्वमेध घट्टम... के जरिये आंध्र प्रदेश से आए तीर्थ यात्रियों को साध रहे हैं।
ऊपर बुजुर्गवार महंगी मांझी तीर्थ यात्रियों से नौकायन के आनंद का बखान करते उन्हें उनकी ही भाषा के मायापाश में बांध रहे हैं। देश-विदेश से बीएचयू और संस्कृत विश्वविद्यालय में पढ़ने आए सैकड़ों युवा विद्यार्थी सुभाष साहनी और महंगी चच्चा की इस महारत के फैन हैं।
घाट पर फूल माला बेचते सुभाष साहनी
- फोटो : अमर उजाला
शीतला मइया के पूजा पाठ के बाद घाट की सीढ़ियां चढ़ रहे मंदिर के महंत शिव प्रसाद पांडेय कहते हैं, भइया! रोजी रोटी से पावरफुल कौनो मास्टर नाहीं हौ, जउन काम कउनो कोचिंग साल दुई साल में नाहीं कर सकेला उ काम धंधा क फंदा घाट के लड़िकन के हफ्ता भर में सिखा देला। केकर केकर नाम गिनाई। हनुमान मालवाले, विजय मांझी, फोटोग्राफर अजय साहनी, चाहें गैलन बेचेवाली जमुना के चाहे जेसे भिड़ा के देख ला बड़े-बड़े भाषा क जानकार झाईं खा जई हें।