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कोरोना में थमी थी काशी की रथयात्रा: डॉक्टर ने घर में शुरू की परंपरा; 7 वर्षों से निकाल रहे प्रतीकात्मक यात्रा

Sun, 05 Jul 2026 01:39 AM IST
Aman Vishwakarma अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।

सार

कोविड-19 लॉकडाउन में काशी की ऐतिहासिक जगन्नाथ रथयात्रा स्थगित होने पर बीएचयू के न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. वीएन मिश्रा ने अपने घर में ही प्रतीकात्मक रथयात्रा शुरू की। भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की प्रतिमाएं स्थापित कर उन्होंने यह परंपरा शुरू की, जो पिछले सात वर्षों से पूरे विधि-विधान और श्रद्धा के साथ लगातार जारी है।
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बीएचयू के न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. वीएन मिश्रा के घर में स्थापित भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और बहन सुभद्रा। - फोटो : संवाद
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विस्तार
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काशी की ऐतिहासिक जगन्नाथ रथयात्रा और उससे जुड़ा मेला धार्मिक आस्था का प्रमुख केंद्र है। वर्ष 2020 में कोविड-19 महामारी के दौरान पहली बार लॉकडाउन के कारण यह परंपरा थम गई थी। तब बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के न्यूरोलॉजी विभाग के वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. वी.एन. मिश्रा ने अपने घर को ही रथयात्रा का मार्ग बना दिया। लॉकडाउन में शुरू हुई यह पहल अब लगातार सात वर्षों से जारी है।

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डॉ. मिश्रा ने बताया कि कोविड महामारी के दौरान सुरक्षा कारणों से काशी की ऐतिहासिक रथयात्रा और मेला स्थगित कर दिया गया था। सदियों पुरानी इस परंपरा के रुक जाने से उन्हें गहरा दुख हुआ। उन्होंने संकल्प लिया कि यदि सार्वजनिक रूप से रथयात्रा नहीं निकल सकती तो अपने घर में ही भगवान जगन्नाथ, बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा की प्रतिमाएं स्थापित कर पूरे विधि-विधान से रथयात्रा का आयोजन करेंगे।

उन्होंने बताया कि तभी से हर वर्ष उनके घर में श्रद्धा और परंपरा के साथ प्रतीकात्मक रथयात्रा निकाली जाती है। परिवार के सदस्य और श्रद्धालु भगवान जगन्नाथ की पूजा-अर्चना कर रथ खींचते हैं। इस आयोजन के माध्यम से वे न केवल अपनी आस्था का निर्वहन करते हैं, बल्कि नई पीढ़ी को भी भारतीय धार्मिक परंपराओं से जोड़ने का प्रयास करते हैं।

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डॉ. मिश्रा के अनुसार, लॉकडाउन के दौरान प्रतिमाएं तैयार कराना भी बड़ी चुनौती थी। उन्होंने मूर्तिकार राजेश कुमार से संपर्क किया और भगवान जगन्नाथ, बलभद्र तथा सुभद्रा की प्रतिमाएं बनाने का अनुरोध किया। राजेश कुमार ने केवल तीन दिनों में तीनों प्रतिमाएं तैयार कर दीं। देखने में लकड़ी जैसी दिखाई देने वाली ये प्रतिमाएं वास्तव में प्लास्टर ऑफ पेरिस (पीओपी) से निर्मित हैं।

डॉ. मिश्रा का कहना है कि परिस्थितियां सामान्य होने के बाद भी उन्होंने अपने घर की इस रथयात्रा की परंपरा को जारी रखा है। उनका मानना है कि श्रद्धा और आस्था का कोई विकल्प नहीं होता। लॉकडाउन में शुरू हुई यह अनूठी पहल आज उनके परिवार की स्थायी धार्मिक परंपरा बन चुकी है।
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