बनारस घराने में तबले की थाप सुस्त पड़ने लगी है। गुरु घरानों की परंपरा में बनारस बाज की खास शैली भले दुनिया में मशहूर हो लेकिन पं. किशन महाराज के बाद पिछले एक दशक में इस विधा में खालीपन बढ़ने लगा है।
जो कलाकार निकले भी, उनमें गिनती के लोगों को छोड़कर किसी को न तो राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिल सकी और न तो वह खुद को खड़ा कर पाए।
कुछ तबला वादक इस घराने से निकले भी तो उन्होंने पैसे के लिए या तो शहर छोड़ा या फिर वह दूसरे देशों में रह रहे हैं। ऐसे में बनारस घराना उम्मीद की नई रोशनी के लिए मोहताज होता नजर आने लगा है।
कहा जा रहा है कि अगर इस वाद्य की विरासत बचाने के लिए समय रहते जिम्मेदार लोग गंभीर नहीं हुए तो आने वाले दिनों में अस्तित्व के लिए जूझना पड़ सकता है।
तबला फर्श से अर्स पर कब और कैसे पहुंचा इस संघर्ष की यात्रा भी कम चिलचस्प नहीं है। 1960 के बाद तक बनारस मेें तबले की बेहद कमजोर स्थिति का पता चलता है।
तब तबला बजाने वाले साजिंदों को महफिलों में बैठने तक की इजाजत नहीं होती थी। गोरखपुर विश्वविद्यालय के संगीत विभागाध्यक्ष रहे प्रो. राजेश्वर आचार्य कहते हैं कि उस दौर में तबला बाइयों के मुजरों पर दरबारों में खड़ा होकर ही बजाया जाता था।
लेकिन बाद में इस साज को संगीत जगत में मान-प्रतिष्ठा दिलाने के लिए पं. किशन महाराज, सामता प्रसाद उर्फ गुदई महाराज ने लंबा आंदोलन चलाया।
ऐसी महफिलों का बहिष्कार किया जाने लगा और कलाकारों को राजाओं या रईसों से ऊंचा स्थान दिलाने के लिए संघर्ष शुरू हो गया।
उस दौर में तबले को आदर के सोपान पर ले जाने वालों में पं. किशन महाराज , गुदई महाराज के अलावा पं. अनोखे लाल मिश्र, पं. शारदा सहाय, पं. वासुदेव महाराज, आशुतोष भट्टाचार्य और लच्छू महाराज, पं. छोटेलाल मिश्र का नाम लिया जा सकता है।
बदले दौर में अब जहां रियाज में कमी आने लगी है, वहीं थोड़ी बारीकियां और खासियत जानने के बाद कलाकारों ने शहर छोड़ना शुरू कर दिया है। ऐसे में बनारस घराने में तबले की थाप कमजोर पड़ने लगी है।
उदाहरण के तौर पर मौजूदा समय ‘बनारस बाज’ की अच्छी तैयारी बजाने वाले पं. राम कुमार मिश्र, शुभ महाराज दिल्ली में रह रहे हैं।
इसी तरह बनारस घराने की स्थापना करने वाले पं. राम सहाय की पांचवीं पीढ़ी के तबला वादक पं. संजू सहाय ने लंदन में बसेरा बना लिया है।
ऐसे में तबले की थाप अब बनारस से दिल्ली, मुंबई और कोलकाता में शिफ्ट होने लगी है। तबले की कार्यशाला लगाने के लिए अब बनारस में मुंबई से पं. सुरेश तलवरकर को बुलाया जाने लगा है।
पिछले वर्ष तलवरकर यहां तीन दिन की वर्कशाप करने के लिए आमंत्रित किए गए थे। बनारस में किशन महाराज की परंपरा की लयकारी बजाने वाले पं. ईश्वर लाल मिश्र, पं. कुबेर मिश्र, पं. किशोर मिश्र, नंद किशोर मिश्र, ललित कुमार, पुंडलीक भागवत, प्रवीण उद्धव, रजनीश तिवारी जैसे कलाकार फन को बचाने की जद्दोजहद कर रहे हैं लेकिन मौका और मुकाम दोनों हासिल न होने से उन्हें जूझना पड़ रहा है।