प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से शुरू कैशलेस लेन-देन की मुहिम में बैंकों ने कागजी कार्रवाई ही की है। नोटबंदी के बाद गांवों को डिजिटल करने के दावे ही किए जा रहे हैं। हकीकत से इसका कुछ भी लेना-देना नहीं है।
हालात यह हैं कि प्रधानमंत्री द्वारा गोद लिए गांव जयापुर और नागेपुर के लोग स्वाइप मशीन के प्रयोग के बारे में जानते तक नहीं हैं। जयापुर में जिन लोगों को मशीन दी गई है, उनके वहां खरीददारी करने तो लोग कार्ड से आ रहे हैं लेकिन दुकानदार का पैसा खाते में नहीं पहुंच रहा है। उधर, नागेपुर गांव में डिजिटल गांव का बोर्ड ही लग पाया है। सबसे खराब स्थिति तो बैंक आफ बड़ौदा की ओर से गोद लिए गए गांव मिसिरपुर में देखने को मिली। यहां दुकानों पर ई-पेमेंट शॉप के बोर्ड तो लगवा दिए गए हैं मगर अधिकतर दुकानदारों को स्वाइप मशीन नहीं मिली है।
यूनियन बैंक आफ इंडिया ने पीएम के सांसद आदर्श गांव जयापुर को डिजिटल गांव घोषित कर दिया है। यहां 12 लोगों को मशीन मिली है लेकिन सामान खरीदने के बाद जो लोग कार्ड से पेमेंट कर रहे हैं, उनका पैसा दुकानदार के खाते में नहीं जमा हो रहा। इसकी शिकायत बैंक अधिकारियों से की गई हैं। आए दिन सर्वर संबंधी गड़बड़ियाें से भी लोग जूझ रहे हैं। गांव के सस्ते गल्ले की दुकान चलाने वालों सहित बहुत से ऐसे लोग हैं, जिन्हें कार्ड का प्रयोग करना नहीं आता है।
नागेपुर में तो लोगों को पता ही नहीं कि गांव को कब गोद लिया गया और स्वाइप मशीन कब मिलेगी, कैसे प्रयोग करना है। गांव में जगह-जगह यूनियन बैंक की ओर से डिजिटल गांव का बोर्ड लगा दिया गया है लेकिन लोग उसके डिजिटल होने का इंतजार कर रहे हैं। हालत यह है कि यहां छोटे-बड़े दुकानदार, ग्रामीणों की बात तो दूर खुद ग्राम प्रधान भी यह बताने में असमर्थ दिखे कि गांव डिजिटल हो गया है। बैंक ने इस बारे में जागरूकता अभियान भी नहीं चलाया है।
बैंक आफ बड़ौदा की ओर से डिजिटल गांव घोषित किया गया है लेकिन हकीकत में कुछ असर नहीं दिख रहा है। यहां बैंक की ओर से छोटी-बड़ी दुकानों पर ई-पेमेंट का बोर्ड लगाया गया है, जिसमें दुकानदार का खाता नंबर लिखा है लेकिन जिन के घर बोर्ड लगा है, वहीं स्वाइप मशीन का इंतजार कर रहे हैं। इक्का-दुक्का लोगों को ही स्वाइप मशीन मिली है पर सर्वर की गड़बड़ी से जूझ रहे हैं। हालत यह है कि गांव में सारा लेन-देने नकद ही हो रहा है।