इन कलाकारों के लिए रंगमंच पेशा नहीं, साधना है। यह नाटक उनके लिए महज प्रस्तुति नहीं, बल्कि इतिहास, संस्कृति और आत्मा से जुड़ने का माध्यम है। हर कलाकार अपने किरदार में उतरते हुए कहीं न कहीं सम्राट विक्रमादित्य के व्यक्तित्व और उनके आदर्शों से स्वयं को जुड़ा हुआ महसूस करता है।
उज्जैन के नवीन यादव इस महानाट्य में खरोश्त की भूमिका निभा रहे हैं और वर्ष 1998 से रंगमंच से जुड़े हैं। बीकॉम की पढ़ाई करने वाले नवीन ने बचपन से अभिनय शुरू किया। मॉडलिंग से करियर की राह पकड़ी, फिल्मों में काम किया, लेकिन अंततः थियेटर ही उनकी पहचान बना।
मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, हैदराबाद और दिल्ली तक अपनी प्रस्तुति दे चुके नवीन कहते हैं कि लाइट एंड साउंड ड्रामा में अभिनय करना एक अलग ही अनुभव है। किरदार निभाते-निभाते वे स्वयं भी उसी मानसिकता में उतर जाते हैं और मंच से उतरने के बाद भी उसका प्रभाव लंबे समय तक बना रहता है।
सम्राट विक्रमादित्य की भूमिका निभा रहे उज्जैन के विक्रम सिंह चौहान पिछले 20 वर्षों से रंगमंच से जुड़े हैं। वर्ष 2017 से वे यह किरदार निभा रहे हैं। उनके लिए यह भूमिका अभिनय नहीं, साधना है।
वे बताते हैं कि मंच पर आते ही कई बार उन्हें ऐसा महसूस होता है कि वे वर्तमान में नहीं, बल्कि उसी ऐतिहासिक युग में खड़े हैं। कुछ क्षणों के लिए वर्तमान का बोध समाप्त हो जाता है और ऐसा लगता है मानो विक्रमादित्य स्वयं उनके भीतर जीवित हो उठे हों।
पहली बार वाराणसी आए विक्रम ने काशी विश्वनाथ और घाटों की आध्यात्मिकता को अपने जीवन का विशेष अनुभव बताया। आठ वर्ष की उम्र से रंगमंच से जुड़ी परिधि मानती हैं कि थियेटर ने उन्हें अनुशासन, आत्मविश्वास और अभिव्यक्ति की शक्ति दी है। उनके अनुसार सिंहासन की हर पुतली केवल कहानी नहीं सुनाती, बल्कि जीवन का एक संदेश देती है।