श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय नई दिल्ली के प्रो. हरेराम त्रिपाठी संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के 35वें कुलपति बने हैं। कुलाधिपति आनंदी बेन पटेल ने बुधवार को आदेश भी जारी कर दिया। प्रो. त्रिपाठी तीन साल तक यह जिम्मेदारी निभाएंगे। वह अगले सप्ताह कार्यभार ग्रहण कर सकते हैं। प्रो. त्रिपाठी दर्शन संकाय के सर्व दर्शन विभाग के प्रोफेसर हैं। उन्हें नव्यन्याय, सांख्य योग, शंकरवेदांत, न्याय-वैषेशिक और संस्कृत साहित्य का भी विशेषज्ञ माना जाता है। बता दें कि कुलपति प्रो. राजाराम शुक्ल का तीन वर्षों का कार्यकाल 23 मई को समाप्त हो गया था। नियुक्ति प्रक्रिया में हो रही देरी को देख कुलाधिपति ने लखनऊ विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. आलोक कुमार राय को कार्यभार सौंपा था। वहीं, अब प्रो. त्रिपाठी की नियुक्ति के बाद सभी अटकलों पर विराम लग गया है।
छात्र से कुलपति बनना गौरव का क्षण
प्रो. त्रिपाठी ने बताया कि जिस संस्थान से अध्ययन किया, वहीं का कुलपति बनना गौरव की बात है। विश्वविद्यालय से पाया है उसको अब लौटाने का वक्त है। प्राच्य विद्या के गौरवशाली संस्थान की कीर्ति पताका को फहराने में जो भी सकारात्मक प्रयास होंगे वह किए जाएंगे। उन्होंने कहा कि नई शिक्षा नीति के अनुरूप पाठ्यक्रमों का निर्माण कराया जाएगा। पहली प्राथमिकता राष्ट्रीय शिक्षा नीति के क्रियान्वयन व शास्त्रों की रक्षा करना होगा। शास्त्रों को जनमानस तक पहुंचाने के लिए संस्कृत को और सरल बनाने का प्रयास होगा। शासन व राज भवन के निर्देश पर 15 अगस्त से पहले शास्त्री-आचार्य की परीक्षा भी करा ली जाएगी।
संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय से की पीएचडी
मूलरूप से देवरिया (कुशीनगर) के निवासी प्रो. त्रिपाठी की प्रारंभिक शिक्षा देवरिया में ही हुई। शास्त्री (स्नातक), आचार्य (स्नातकोत्तर) व पीएचडी तक की पढ़ाई संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय से की। वर्ष 1993 में राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान (रणवीर कैंप-जम्मू) में बतौर अनुसंधान सहायक पद से शुरुआत की। छह माह बाद श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के दर्शन संकाय में नियुक्ति हुई। 2009 में सर्व दर्शन विभाग में प्रोफेसर बने। वर्ष 2003 में महर्षि बादरायण राष्ट्रपति पुरस्कार, शंकर वेदांत, पाणिनी, उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान की ओर से विशिष्ट पुरस्कार सहित अन्य पुरस्कार व सम्मान मिल चुके हैं। प्रो. त्रिपाठी की अब तक पांच पुस्तकें और 10 शोध पत्र प्रकाशित हो चुके हैं। उन्होंने ई-पीजी पाठशाला के लिए 19 मॉड्यूल बनाए हैं।