कार्यवाहक मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के ड्रीम प्रोजेक्ट वरुणा कॉरिडोर में फिर भीषण आग धधकने के बाद कई सवाल उठ रहे हैं। भरी दोपहरी में सुरक्षा कर्मचारियों की मौजूदगी के बाद आग कैसे लगी, सुरक्षाकर्मियों के होते हुए हुड़दंगी वहां पहुंचे कैसे और कैसे आग लगा दी? सभी सामान एकत्र करके एक जगह रखे गए और ऐन होली वाले दिन ही आग लगी..?
यह हुड़दंगियों की शरारत है या फिर सुनियोजित साजिश, यह जांच का विषय है। पहली बार बीते जनवरी माह में आग लगी थी। हालांकि वह आग तत्काल बुझा ली गई और कोई नुकसान नहीं हुआ। लेकिन इस बार तो आग में दो जेसीबी समेत लाखों का सामान जलकर राख हो गया।
वरुणा कॉरिडोर का विवादों से पुराना नाता रहा है। काम शुरू होने से पहले ही योजना को लेकर सवाल उठने लगे थे। डिजाइन को लेकर, निर्माण सामग्री, ग्रीन बेल्ट, रेलिंग, नाले आदि को लेकर कई बार तमाम सवाल उठे। काम का जिम्मा सिंचाई विभाग को दिया गया। निवर्तमान पीडब्ल्यूडी और सिंचाई राज्य मंत्री सुरेंद्र पटेल की इस प्रोजेक्ट पर खास निगहबानी रही।
बावजूद इसके विवाद गहराते ही गए। काम की गुणवत्ता से लेकर अतिक्रमण तक के मसले पर हर बार सवाल उठते रहे और मंत्री से लेकर अफसर तक जांच समिति बिठाने और कार्रवाई करने के वादे करते रहे। अप्रैल 2016 में शुरू हुआ कॉरिडोर का काम इस साल इसी महीने में पूरा होना था लेकिन अब तक महज 40 से 50 फीसदी ही काम हो सका है।
जिस तरह जेएनएनयूआरएम के तहत बगैर एसटीपी का निर्माण कराए सीवर पाइन लाइन डालने के लिए पूरे शहर को खोद डाला गया, उसी तरह बगैर वरुणा में गिरने वाले नालों को रोके यहां कॉरिडोर का काम शुरू करा दिया गया।
जब दबाव बढ़ा तो आननफानन में नदी के दोनों किनारे सीवर की पाइप लाइन डाली जाने लगी। वीडीए ने भी नदी के दोनों तरफ 50 मीटर ग्रीन बेल्ट घोषित कर निर्माण कराने से आम लोगों को तो रोक दिया, लेकिन रसूखदारों को खुली छूट दी गई।
इस दायरे में बगैर अनुमति के निर्माण कराने वालों को 762 लोगों को नोटिस पकड़ाया गया और नोटिस देने के महीनों बाद जब कार्रवाई की बारी आई तो हर बार टीम को विरोध के चलते लौटना पड़ा।