कहावत है कि बदलाव के लिए पहल खुद करनी पड़ती है। छोटी ही सही, लेकिन सकारात्मक कोशिश बड़े से बड़े काम को आसान कर देती है। यह देखने को मिल रहा है संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में। यहां चार दशकों से उपेक्षित पड़े मंदिरों और कुंड की सूरत अब बदलने लगी है। सौ साल से भी अधिक प्राचीन मंदिर अब नए कलेवर में सामने आने लगे हैं।
संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. राजाराम शुक्ल ने सम्मान स्वरूप मिले 21 हजार रुपये से परिसर के छह मंदिर और कुंडों को संवारने की पहल शुरू की। साथ ही इसके लिए लोगों से आगे आने की अपील की। इसका असर यह हुआ कि सनातनधर्मी और व्यापारियों ने मदद के लिए हाथ आगे बढ़ाए। काशी ही नहीं, देश भर से उद्योगपतियों ने मंदिरों के जीर्णोद्धार के लिए दान दिया। अब विश्वविद्यालय परिसर स्थित मंदिरों का स्वरूप बदलने लगा है। जन सहयोग से मंदिर के जीर्णोद्धार का कार्य इन दिनों तेजी से चल रहा है। दो मंदिरों का काम पूरा हो चुका है और दो पर अभी काम चल रहा है। परिसर के अन्य मंदिरों के जीर्णोद्धार के लिए विश्वविद्यालय के अध्यापक व कर्मचारी भी आगे आ रहे हैं। इसके अलावा मंदिर परिसर में बने कुंड का भी जीर्णोद्धार कराकर फिर से कमल खिलाने की तैयारी चल रही है। पंचदेव मंदिर परिसर में छह मंदिर हैं। इसमें दक्षिणामुखी हनुमान के अलावा गणेश, महादेव, राधा-कृष्ण, भगवान विष्णु, श्रीराम दरबार के मंदिर हैं।
विश्वविद्यालय को दान में मिला था मंदिर
कुलपति प्रो. राजाराम शुक्ल ने बताया कि परिसर स्थित पंचदेव मंदिर करीब 150 साल पुराना है। यह मंदिर जौनपुर के तत्कालीन राजा यादवेंद्र दत्त दुबे ने विश्वविद्यालय को दान में दिया था। मंदिर में पूजा-पाठ करने के लिए विश्वविद्यालय की ओर से पुजारी भी नियुक्त हैं। मंदिर परिसर में स्थित कुंड को संवारने के लिए भी काम चल रहा है। हृदय योजना के तहत इसके सुंदरीकरण के लिए प्रशासन से पत्राचार किया गया है।