पहली बार अस्सी स्थित जगन्नाथ मंदिर के पास स्थित पुरी पीठ की शाखा पूर्वाम्नाय श्री दक्षिणामूर्ति मठ में निभाई जाएगी। मठ के प्रधान दंडी संन्यासी स्वामी वनवैभवारण्य सरस्वती ने बताया कि राग-भोग की परंपरा काशी में कायम करने की ट्रस्ट श्री जगन्नाथ जी से अनुमति मांगी गई थी। इसकी स्वीकृति मिल गई है।
वहां की परंपरा के अनुसार भगवान की डोली यात्रा निकलने से पहले उन्हें रसगुल्ले और खाजा का भोग लगाया जाएगा। वहीं, रथयात्रा के अंतिम दिन 18 जुलाई को रथारूढ़ भगवान की वापसी के दिन (19 जुलाई को भोर में) भगवान रसगुल्ले का भोग ग्रहण करेंगे। इसके बाद अस्सी स्थित मंदिर में प्रवेश करेंगे।
स्वामी वनवैभवारण्य सरस्वती ने बताया कि भगवान की डोली यात्रा के पूर्व पुरी की परंपरा के अनुसार रथ की शंकराचार्य पूजा करते हैं। यहां मठ की ओर से पूजा कराई जाएगी। प्रभु के डोली में बैठने के पहले डोली की सफाई कर गंगाजल का छिड़काव किया जाएगा।
ट्रस्ट के सचिव शैलेष त्रिपाठी ने बताया कि पुरी पीठ के शंकराचार्य जगद्गुरु स्वामी निश्चलानंद सरस्वती ने अप्रैल में 10 दिनों तक काशी प्रवास किया था। पूर्वाम्नाय श्री दक्षिणामूर्ति मठ में उनकी अगुवाई में मठ में दक्षिणामूर्ति मंदिर के जीर्णोद्धार के अनुष्ठान हुए थे।
14 को परवल से बने जूस का भगवान को लगेगा भोग
मंदिर के पुजारी पं. राधेश्याम पांडेय ने बताया कि भगवान के 14 दिनों तक अज्ञातवास के बाद 14 जुलाई को परवल से बनी हर तरह की सामग्री का भगवान को भोग लगाया जाएगा। परवल के जूस का भी भोग लगेगा। इसके बाद वह दर्शन देंगे। 15 जुलाई को पूड़ी, सब्जी, मिष्ठान आदि का भोग लगेगा। डोली यात्रा के रथयात्रा पहुंचने के बाद प्रमुख रूप से पेड़े का भोग लगेगा। रथयात्रा मेले के दौरान तीन दिन अलग-अलग तरह की सब्जी-पूड़ी, नानखटाई आदि का भोग लगेगा। अंतिम दिन कटहल की सब्जी का भोग लगता है।