चूहे सीवर लाइन और चैंबर के किनारे सुरंग बनाते हैं, जिससे आसपास की मिट्टी ढीली होती जाती है। यदि कहीं से पानी का रिसाव भी हो, तो मिट्टी के महीन कण बहने लगते हैं। धीरे-धीरे अंदर खाली जगह (वॉयड) बन जाती है। ऊपर का भार बढ़ने पर चैंबर धंस सकता है या सड़क बैठ सकती है।
यही प्रक्रिया दुनिया के कई शहरों में सिंकहोल बनने की प्रमुख वजह मानी गई है।विशेषज्ञों का कहना है कि सामान्य सीवर में जब खाने-पीने का कचरा तथा होटलों और घरों का जैविक अपशिष्ट पहुंचता है, तो वह चूहों के लिए भोजन बन जाता है। भोजन मिलने से उनकी संख्या बढ़ती है और वे स्थायी बिल बना लेते हैं।
पक्का महाल की चुनौती इसलिए और गंभीर है, क्योंकि यहां अधिकांश गलियां संकरी हैं और नीचे दशकों पुराना सीवर नेटवर्क बिछा है। किसी भी हिस्से में खोदाई आसान नहीं है। ऐसे में यदि जमीन के भीतर लगातार खाली स्थान बनते रहे, तो भविष्य में मरम्मत की लागत और जोखिम दोनों बढ़ सकते हैं। जलकल विभाग फिलहाल क्षतिग्रस्त चैंबरों की मरम्मत करा रहा है, लेकिन चूहों की संख्या नियंत्रित करने या वैज्ञानिक निगरानी की कोई अलग व्यवस्था नहीं है।
ऐसे खोखली होती है जमीन
चूहे सीवर चैंबर के किनारे बिल बनाते हैं। सुरंग बनने से मिट्टी की पकड़ कमजोर हो जाती है। पाइप या चैंबर से रिसाव होने पर मिट्टी बहने लगती है। इससे अंदर खाली जगह (वॉयड) बन जाती है। ऊपर से दबाव बढ़ने पर चैंबर या सड़क धंस सकती है।