इसके बाद बृहस्पतिवार को नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (एनएमसीजी) के कार्यालय में निगरानी टीम की पहली बैठक हाइब्रिड मोड में हुई। इसमें गंगा में माइक्रोप्लास्टिक के स्रोत, उसकी मात्रा और जलीय पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ने वाले प्रभावों का आकलन करने पर चर्चा हुई। इस पहल में बीएचयू, आईआईटी रुड़की समेत आठ संस्थानों के वैज्ञानिक शामिल हैं।
बीएचयू के पर्यावरणविद डॉ. कृपा राम ने काशी में गंगा के पानी में माइक्रोप्लास्टिक की मौजूदगी पर रिपोर्ट तैयार की है। उनके अनुसार, सरायमोहना घाट पर सबसे ज्यादा सात कण प्रति लीटर मिले। दशाश्वमेध घाट पर चार से पांच, मार्कंडेय महादेव घाट पर दो से तीन और गड़वाघाट पर एक से 1.8 कण प्रति लीटर दर्ज किए गए। शूलटंकेश्वर महादेव घाट पर इनकी संख्या सबसे कम रही।
हॉटस्पॉट और प्रदूषण के स्रोतों की होगी पहचान
डॉ. कृपा राम ने बताया कि पांच मिलीमीटर से छोटे प्लास्टिक कणों को माइक्रोप्लास्टिक कहा जाता है। गंगा में इनकी मौजूदगी और इनके स्रोतों की पहचान करना जरूरी है। निगरानी अभियान के तहत प्रदूषण के हॉटस्पॉट, माइक्रोप्लास्टिक के बहाव के रास्तों और इसके संभावित प्रभावों का पता लगाया जाएगा। इसके लिए गंगा में माइक्रोप्लास्टिक की नियमित निगरानी का तंत्र विकसित किया जाएगा, ताकि प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए प्रभावी कदम उठाए जा सकें।