वाराणसी के रामनगर पीएसी तिराहे से गुजरना बेहद भयावह है। कदम ठिठक जाते है। नजरें शर्म से झुक जाती हैं। संवेदनाओं के मरण को देख रूह कांप जाती है। शहादत के उस आहत अहाते में जो देखा, उसने झकझोर कर रख दिया।
याद आई वह पंक्ति, ‘...वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशां होगा।’ सच, इस निशां को देखकर लगा कि ऐसे स्मरण से तो विलोप हो जाना ही अच्छा था। शहीदों की यह स्मृति उपहास लगती है। जहां न भाव हैं और न श्रद्धा। जहां फूल नहीं, बस धूल है। स्मारक, जो अब कपड़े सुखाने, खाना पकाने, नहाने और रहने का ठौर है। जहां सुवास नहीं, मलिनता का वास है।
इस आंगन में दो कालखंडों की कुर्बानी है और दोनों की आंखों में पानी है। सुना है, गणतंत्र दिवस की यह पूर्व संध्या बड़ी सुहानी है। प्रथम विश्व युद्ध में शहीद हुए बनारस स्टेट के जवानों का यह ऐतिहासिक स्मारक लार्ड रीडिंग द्वारा 1921 में स्थापित किया गया था।
उस वक्त ब्रिटिश सेना द्वारा बनारस से 1005 जवान युद्ध में भेजे गए थे। इनमें से 82 लाल लौटकर नहीं आए। स्मारक में एक स्तंभ पर उन सभी शहीदों के नाम अंकित हैं, जो अब गिरने के कगार पर है। आसपास के पत्थर उखड़ गए हैं। यहीं 36वीं वाहिनी पीएसी के 10 शहीद जवानों की स्मृति पट्टिका लगी है। इसके आखर धुंधले पड़ गए हैं।
2004 में नक्सल उन्मूलन ड्यूटी में वाहिनी के 10 जवान मातृभूमि की बलिवेदी पर न्यौछावर हो गए थे। धूल-धूसरित इस धरोहर की रेलिंग पर चारों ओर कपड़े लटके हैं। अंदर एक महिला कपड़े धो रही है। दूसरी ओर खाना पक रहा है। एक बच्चा वहीं नहा रहा है। यह उन्हीं का ठौर बन गया है।
ये लोग इसकी महत्ता नहीं जानते और जानने वाले जान-बूझकर मुंह फेरे बैठे हैं। चारों ओर यही मलिनता नजर आती है। बीचोंबीच होने के बावजूद यह स्मारक अनदेखा और उपेक्षित पड़ा है। बेरंग हो चुके शिलाखंडों पर कुछ धुंधले-धुंधले अक्षर दिखते हैं। लिखा है, वो शहीद हो गए ताकि हम जीते रहें। जब इस बारे में पीएसी से पूछा गया तो वह पल्ला झाड़ती नजर आई।
करीब तीन महीने पहले इस स्मारक के लिए कुछ समाजसेवियों ने आवाज उठाई थी। उसके बाद इसे नगर पालिका को सौंप दिया गया लेकिन इसकी दयनीय हालत में बदलाव नहीं आया। पहले पीएसी ही इसकी देखरेख करती थी।