ये है न्यायालय उठने तक की सजा
न्यायालय उठने तक की सजा का आशय है कि दोषी को न्यायालय द्वारा निर्धारित अवधि तक अदालत में मौजूद रहना होता है। न्यायालय की कार्यवाही समाप्त होने और अदालत के उठने के साथ उसकी सजा पूरी मानी जाती है। हालांकि, इस सजा से दोषसिद्धि समाप्त नहीं होती। इस तरह के फैसले में दंड के साथ दोषी को अपनी गलती का अहसास कराने और भविष्य में अपराध से दूर रहने का संदेश भी दिया जाता है।
जुआ खेलने के मामले में 200 रुपये जुर्माना
साल 2023 में पुलिस ने जुआ खेलने के आरोप में शिवपुर निवासी भैयालाल को गिरफ्तार किया था। करीब दो साल चले मुकदमे के बाद अदालत ने हाल ही में उसे दोषी करार देते हुए न्यायालय उठने तक की सजा सुनाई। दोषी न्यायालय की कार्यवाही पूरी होने तक अदालत में मौजूद रहा। उसने अदालत से भविष्य में दोबारा गलती न करने का भरोसा दिलाया। अदालत ने उस पर 200 रुपये का अर्थदंड लगाया। अर्थदंड अदा नहीं करने पर तीन दिन की अतिरिक्त सजा भुगतने का आदेश दिया गया।
आर्म्स एक्ट के पुराने मामले में 700 रुपये अर्थदंड
चेतगंज थाने में वर्ष 2000 में आर्म्स एक्ट के तहत दर्ज मामले में आरोपी वीरेंद्र कुमार को अदालत ने दोषी करार दिया। उसे न्यायालय उठने तक की सजा सुनाई गई। साथ ही 700 रुपये का अर्थदंड लगाया गया। अर्थदंड अदा नहीं करने पर उसे 10 दिन की जेल की सजा भुगतनी होगी।
चोरी के प्रयास में 500 रुपये अर्थदंड
सिगरा थाने में वर्ष 2025 में चोरी के प्रयास और धमकी देने के मामले में आरोपी मनीष को अदालत ने दोषी करार दिया। उसे न्यायालय उठने तक की सजा सुनाई गई। साथ ही 500 रुपये का अर्थदंड लगाया गया। अर्थदंड जमा नहीं करने पर 10 दिन जेल में रहने का आदेश दिया गया।