एनजीटी ने स्पष्ट किया कि स्टॉर्म वाटर और नालों को स्थायी रूप से टैप करना अनुमन्य नहीं है, क्योंकि इससे नदी की पारिस्थितिकी को नुकसान पहुंचता है। ऐसी टैपिंग केवल अस्थायी व्यवस्था के रूप में ही की जा सकती है, वह भी स्पष्ट समय-सीमा के साथ। एनजीटी ने यह भी पाया कि असि नदी, जो गंगा की सहायक नदी है, को नाला मानकर टैप किया गया है, जो कि गंगा नदी (पुनर्जीवन, संरक्षण एवं प्रबंधन) प्राधिकरण आदेश, 2016 का स्पष्ट उल्लंघन है। इस संबंध में राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन से स्पष्टीकरण तलब किया गया है।
पीठ ने यह भी चिंता जताई कि कई सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट संभवतः गंगा के बाढ़ क्षेत्र में स्थित हैं। एनएमसीजी को निर्देश जारी कर कहा गया है कि वह यह स्पष्ट करे कि डीपीआर स्वीकृत करते समय बाढ़ क्षेत्र से संबंधित नियमों का पालन किस प्रकार किया गया।
यह भी उल्लेख किया गया कि वाराणसी में 4.14 लाख घरों में से अब तक केवल 1.56 लाख घरों को ही सीवर नेटवर्क से जोड़ा गया है और राज्य सरकार को 100 फीसदी सीवर कनेक्टिविटी की समय-सीमा प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए हैं। उत्तर प्रदेश सरकार एवं एनएमसीजी को छह सप्ताह के भीतर विस्तृत प्रगति रिपोर्ट दाखिल करने का समय दिया गया है। इस मामले की अगली सुनवाई 21 अप्रैल को होगी।