केवल बीएचयू में ही इसकी जांच होती है। यहां मरीजों का दबाव इतना अधिक है कि एक स्कैन के लिए 2-3 महीने तक की तारीख दे दी जाती है। जिला अस्पताल में एमआरआई के लिए बिल्डिंग भी बनी, लाखों की लागत से मशीन भी आई, लेकिन विशेषज्ञ के अभाव में वहां ताला लटक रहा है। मंडलीय अस्पताल कबीरचौरा और जिला अस्पताल में सीटी स्कैन की सुविधा तो है, लेकिन सुविधाओं के अभाव में मरीजों को इसके लिए भी भागम-भाग करना पड़ता है।
मंडलीय अस्पताल में प्रतिदिन औसतन 27 मरीजों का सीटी स्कैन होता है, जबकि जिला अस्पताल में प्रतिदिन 80 से अधिक मरीजों का सीटी स्कैन होता है। यहां भीड़ इतनी अधिक है कि मरीजों को दो-तीन दिन इंतजार करना पड़ता है। आठ माह पहले ईएसआईसी अस्पताल को मेडिकल कॉलेज का दर्जा मिला लेकिन वहां भी सुविधाएं राम भरोसे ही हैं। ईएसआईसी अस्पताल में एक्स-रे और अल्ट्रासाउंड के लिए भी मरीजों को बाहर भटकना पड़ता है। वहीं मंडलीय और जिला अस्पताल में इन सुविधाओं के लिए लंबी लाइन लगती है। कई बार मरीज निजी लैब में जांच कराने को मजबूर होते हैं।
जिले में बीएचयू को छोड़ अन्य अस्पतालों में कार्डियोलॉजिस्ट, प्लास्टिक सर्जन, नेफ्रोलॉजिस्ट और न्यूरोलॉजिस्ट जैसे सुपर स्पेशलिस्ट डॉक्टरों के पद खाली पड़े हैं। जिला अस्पताल में हृदय रोग विशेषज्ञ नहीं हैं, जबकि न्यूरो सर्जन किसी भी अस्पताल में नहीं हैं। इमरजेंसी की स्थिति में मरीजों को सीधे बीएचयू रेफर कर दिया जाता है, जिससे रास्ते में ही जान जाने का जोखिम बना रहता है। जिला, मंडलीय और अन्य अस्पतालों में न्यूरो के सर्जन नहीं हैं। इमरजेंसी की स्थिति में मरीज को परिजन बीएचयू न ले जाकर निजी अस्पतालों में ले जाते हैं। मरीजों के तीमारदारों का कहना है कि बीएचयू में भीड़ इतनी अधिक है कि वहां इलाज कराना मुश्किल होता है।
बनारस में स्वास्थ्य सुविधाएं काफी अच्छी चल रही हैं। सीएचसी से लेकर जिला अस्पतालों तक प्रशिक्षित चिकित्सकों की तैनाती की गई है। जिन सुविधाओं का अभी अभाव है, वह मंडलीय अस्पताल में बनने वाले सुपर स्पेशियलिटी में मिलने लगेंगी। -डॉ. एनडी शर्मा, अपर निदेशक, स्वास्थ्य विभाग