इस दौरान उस्ताद के साथ पांच दशक तक दुक्कड़ पर संगतकार रहे बसारत हुसैन के बेटे जाकिर हुसैन और उस्ताद के पोते आफाक हैदर ने शहनाई पर मातमी धुन पेश की। उन्होंने उस्ताद के चर्चित नौहे मारा गया तीर से बच्चा रबाब का..., रो-रो के कहती थी जहरा... की धुन जब शहनाई पर पेश की तो सभी की आंखें नम हो गईं। मकबरे पर दोपहर तक उनके चाहने वाले पहुंचकर गुलपोशी करते रहे।
वहीं, शाम को उस्ताद के हड़हासराय स्थित पैतृक आवास पर लंबे समय बाद विरासत-ए-बिस्मिल्लाह कार्यक्रम हुआ। जाकिर हुसैन के साथ उस्ताद के पोते अरशद अब्बास, परपोते गाजी अब्बास, जैन अब्बास और मोहम्मद हुसैन ने शहनाई पेश कर सांगीतिक नमन किया।
उन्होंने उस्ताद की उन सभी बंदिशों को शहनाई पर साधा, जिसे वे देश-विदेश में बजाते थे। उनकी प्रसिद्ध धुन रघुपति राघव राजाराम... भी पेश किया। इसके बाद राग मधुवंती में तीनताल की बंदिश को विस्तार दिया। इसके बाद उस्ताद की पसंदीदा कजरी मिर्जापुर कईला गुलजार हो, कचौड़ी गली सून कइला बलमू... की धुन पेश की।
दुक्कड़ पर मो. सैफ ने संगत की। संयोजन आफाक हैदर व शकील अहमद जादूगर ने किया। मकबरे पर अकीदत पेश करने वालों में शहनाई वादक महेंद्र प्रसन्ना, अजादार हुसैन, हादी हुसैन के अलावा उस्ताद की बेटी जरीना बेगम, पोती मिनहाज फातमा, शिफा, प्रमोद वर्मा आदि रहे।
काशी को भारत रत्न दिलाने वाले उस्ताद को नेताओं-अधिकारियों ने भुला दिया
शहनाई के जरिये दुनिया भर में काशी को पहचान दिलाने वाले उस्ताद बिस्मिल्लाह खां की बरकी पर उनके मकबरे पर कोई अधिकारी व नेता नहीं पहुंचा। आफाक हैदर ने कहा कि जब दादा जी थे तो देशभर के नेता और नामचीन लोग उनसे मिलने के लिए परेशान रहते थे।