Varanasi News : तबला वादक उस्तान जाकिर हुसैन की माैत की खबर सुनते ही काशी के साहित्य घराने में भी शोक की लहर दाैड़ गई। तबला वादकों से लेकर तमाम साहित्यिक लोगों ने उन्हें नमन किया, श्रद्धांजलि दी। उनको चाहने वाले सोशल मीडिया पर भी उनके बारे में और उनसे जुड़ी चीजों को शेयर कर रहे थे।
उस्ताद जाकिर हुसैन कहते थे कि तबला सरस्वती हैं... इसकी इज्जत करो, इसे रास्ते की कोई चीज न समझो। उसको एक पूजा की चीज समझो। हर वाद्य में एक रूह है, एक आत्मा है। अगर आपको एक अच्छा कलाकार बनना है तो आपको उस वाद्य से इजाजत लेनी है कि वह वाद्य आपको स्वीकार करे।
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ये बहुत जरूरी चीज है। अगर उस वाद्य ने आपको स्वीकार कर लिया तो समझिए कि दरवाजा खुल गया। जब साज कलाकार से सहमत हाेता है जो आप चाहेंगे वह बजेगा। यही कारण है कि जब भी मैं विदेश यात्रा पर तबले के साथ जाता था तो लोग यही कहते थे कि इज दिस ए उस्ताद जाकिर हुसैन इंस्ट्रूमेंट...।
यह कहना है तबला वादक पद्मविभूषण पं. किशन महाराज के नाती रजनीश मिश्र का। यह बहुत कम कलाकारों को नसीब हो पाता है कि किसी वाद्ययंत्र की पहचान उनके नाम से हो। तबला मतलब ही जाकिर हुसैन थे, यह कितनी बड़ी बात थी।
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तबला वादक पं. रजनीश मिश्र ने बताया कि मुझे याद है 2008 में जाकिर हुसैन साहब बनारस के महाशिवरात्रि महोत्सव में भाग लेने आए थे। उनको पता चला कि नानाजी की तबीयत खराब है तो वह चुपके से, बिना किसी को बताए, छिपते हुए रिक्शे से अस्पताल पहुंचे थे। शाम को होने वाले कार्यक्रम में उन्होंने तबला वादन की प्रस्तुतियां दी थीं। कई बार यात्रा के दौरान उनसे एयरपोर्ट पर मुलाकात हो जाया करती थी।
एक बार का वाकया मुझे याद है कि 2012 में दिल्ली में एक रेस्तरां में पहुंचा तो वहां जाकिर हुसैन साहब भोजन कर रहे थे। अचानक उनको देखकर मैंने अदब से नीचे बैठ गया तो उन्होंने कहा कि अरे तुम जिस गुरु के चेले हो मैं भी उनका चेला हूं। मेरे बगल में बैठो। उनकी यही सादगी तो उनके चाहने वालों को अपना कायल बनाती थी।