उसके छह महीने बाद वह मानसिक रूप से डिस्टर्ब हो गए थे। पिताजी ने इलाज करवाया लेकिन आगे पढ़ाई नहीं कर सके। रामानुज ने बताया कि उसके बाद अक्तूबर 2010 में वह घर छोड़कर कहीं चले गए थे। उन्हें कई जगह ढूंढा गया पर नहीं मिले। उसके बाद इनकी गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई गई। फिर हमने लोगों के कहने पर उनका सांकेतिक दाह संस्कार भी कर दिया। उमेश के दो पुत्र और दो पुत्रियां। एक पुत्री की शादी पिछले साल हुई है।
घायलों और लावारिसों की मदद को तैयार रहते हैं अमन
काशी के अमन कबीर हमेशा लावारिसों और घायलों की मदद के लिए तैयार रहते हैं। शहर में कहीं से भी सूचना मिलने पर वह मदद के लिए बाइक एंबुलेंस लेकर पहुंच जाते हैं। घायल को प्राथमिक उपचार के बाद मंडलीय चिकित्सालय में भर्ती कराने की जिम्मेदारी वह स्वयं उठाते हैं। उन्होंने लावारिसों के लिए अपने घर में कबीर छाया कुटिया भी बना रखी है।