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Varanasi News: तुर्किये ने बढ़ाई कालीन उद्यमियों की चुनौती

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मनोज कुमार गुप्ताभदोही। कालीन उद्यमियों की चुनौतियां बढ़ती जा रही हैं। अब भदोही के कालीन उद्यमियों को तुर्किये के कालीन मशीन से बने कालीन से चुनौती मिल रहा है। भारत में बेल्जियम और तुर्किये के सस्ते कालीन का आयात होने लगा है।
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भदोही के हस्तनिर्मित कालीन की दुनिया भर में अलग पहचान है। अपनी डिजाइन, आकर्षक रंग और टिकाऊ कालीन यूरोपीय और अमरीकी देशों की पहली पसंद हैं। वर्ष 2022-23 में देश में कालीन का सलाना कारोबार 14776 करोड़ रुपये तक पहुंच गया था। अब यहां के उद्यमी तुर्कीये की मशीन से बनी कालीन से परेशान हैं। हाथ से बनने के कारण भदोही के कालीन की लागत ज्यादा आती है। इसके उलट तुर्किये में कालीन मशीनों से बनाए जा रहे हैं और उनकी कीमत कम होने के कारण लोकप्रिय भी हो रहे हैं। तुर्किये ने वर्ष 2015 तक भारत से 141 करोड़ रुपये के कालीन खरीदता था लेकिन इंपोर्ट ड्यूटी बढ़ने के बाद वर्ष 2021-22 में मात्र 41 करोड़ के कालीन वहां भेजे गए।
भारतीय कालीन का तुर्किये में निर्यात कम नहीं हो रहा है बल्कि वहां के कालीन भारत समेत दूसरे देशों में बिकने लगे हैं। तुर्किये के कालीन मशीन से बनने के कारण भारतीय गलीचों की तुलना में 50 फीसदी तक सस्ते होते हैं। उनको आसानी से धुला जा सकता है। सिंथेटिक धागों के इस्तेमाल के कारण वे जल्दी खराब भी नहीं होते हैं। वैश्विक मंदी में यूरोपीय देशों की आर्थिक स्थिति खराब है। लोग बुनियादी आवश्यकताओं को पूरा करने में लगे हैं। ऊपर से वर्ष 2015 में तुर्किये ने भारतीय कालीनों पर आयात ड्यूटी 10 प्रतिशत से बढ़ाकर 85 प्रतिशत कर दी। इसके चलते तुर्किये को भारत के कालीन निर्यात लगातार घटा है। इसका लाभ तुर्किये को मिल रहा है। उनके कालीन भारत ने भी आयात होने लगे हैं। महानगरों के तमाम शोरूम में तुर्किये की कालीन मिल रहे हैं और बड़े होटलों में भी तुर्किये, बेल्जियम और चीन कालीन बिछाए जा रहे हैं। कालीन उद्यमी रवि पाटोदिया बताते हैं कि तुर्किये के कालीन के कालीन सस्ते हैं और वे देखने में बेहद लुभावने हैं। उन्हें धुला भी आसानी से जा सकता है। उनके रंग समय के साथ फीके नहीं पड़ते हैं। तुर्किये के कालीन उद्यमी भारत से ही धागे खरीदते हैं। भारत से बड़े पैमाने पर सिंथेटिक धागों का आयात तुर्किये में हो रहा है।
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