भारत रत्न डॉ. भगवान दास
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देश के पहले भारत रत्न डॉ. भगवान दास ने शिक्षा और राजनीति में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने स्त्री शिक्षा की अलख जगाने के लिए समाज की बेड़ियों को तोड़ा। इसकी शुरूआत अपने घर से ही की। उनकी शख्सियत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि देश के राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री भी उनकी सलाह पर अमल करते थे, उनका सम्मान हृदय से करते थे। 12 जनवरी 1869 को काशी के इस महान दार्शनिक का जन्म शहर के साह परिवार में हुआ था।
भारत रत्न डॉ. भगवान दास के प्रपौत्र डॉ. पुष्कर रंजन ने बताया कि पिताजी स्व. चितरंजन साह परदादा जी की कहानियां सुनाया करते थे। जीवन के मूलभूत सिद्धांतों में से डॉ. भगवान दास ने सबसे पहले और सबसे महत्वपूर्ण शिक्षा को अत्यधिक महत्व दिया। इसमें खासकर महिला शिक्षा पर उनका विशेष ध्यान था। उनका दृढ़ विश्वास था कि हमारे पितृसत्तात्मक समाज में महिलाओं का उत्थान, मुक्ति और सशक्तीकरण शिक्षा के जरिये ही संभव है।
उन्होंने डॉ. एनी बेसेंट की मदद से सेंट्रल हिंदू स्कूल, वसंता कॉलेज और कृष्णमूर्ति फाउंडेशन राजघाट की स्थापना की। जब सेंट्रल हिंदू गर्ल्स स्कूल की स्थापना हुई तब लड़कियों को शिक्षा के लिए स्कूल भेजना सम्मान की नजर से नहीं देखा जाता था। डॉ. भगवान दास ने इस मिथक को दूर किया और अपनी दोनों बेटियों और बड़ी बहू को पढ़ाई के लिए भेजकर इस पूर्वाग्रह को दूर किया। ये तीनों सेंट्रल हिंदू गर्ल्स स्कूल की पहली छात्राएं थीं। वे महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के संस्थापक कुलपति रहे। पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री, चंद्रशेखर आजाद उनके शिष्य रहे।