सात्विक पुरुष, संत और साधक जो आहार ग्रहण करते हैं, उसी तरह का पवित्र प्रसाद अपने परमात्मा को भी अर्पित किया जाता है। इसमें शुचिता और पवित्रता का ध्यान रखा जाता है। प्रसाद चढ़ाने के बाद इसे परमात्मा का आशीर्वाद मानकर ग्रहण किया जाता है। हर सनातनी के घर में यह परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है। अपने भोजन के पहले परमात्मा को प्रसाद ग्रहण कराने की परंपरा रही है। इसके अलावा एक रोटी गोमाता को और अंतिम रोटी श्वान को निकलती थी। बड़े देवालयों में भी यही परंपरा बड़े स्तर पर निभाई जाती है और प्रसाद भक्तों में वितरित होता है।
प्रसाद की शुचिता की जिम्मेदारी नागरिकों की
प्रो. द्विवेदी ने बताया कि भगवान का प्रसाद ग्रहण करने से मन में प्रसन्नता और आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार होता है। अच्छी बुद्धि का निर्माण होता है। अद्वैत दर्शन में पंचमय कोश की परिकल्पना है और इसमें अन्नमय कोश का वर्णन है। भारत की आध्यात्मिक ऊर्जा के केंद्र हैं मंदिर हैं। आध्यात्मिक ऊर्जा, शक्ति और चेतना के संचार के लिए मंदिरों के भोग राग में शुचिता का ध्यान देना नागरिकों का भी कर्तव्य है और जो लोग वहां महत्वपूर्ण दायित्वों पर बैठे हैं उनकी भी जिम्मेदारी है।