टाउनहाल में लगे संस्कृत पुस्तक मेले में पहली बार उपलब्ध
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फारसी भाषा में सोने के पानी से लिखी इस रामायण का पहला शब्द है ‘बिस्मिल्लाह’। जैसे राम सिर्फ हिंदुओं के देवता नहीं, प्राचीन संस्कृति के प्रतिबिंब हैं, ठीक वैसे ही दुनिया की इकलौती ये रामायण भी गंगा-जमुनी तहजीब का आइना है।
इसके शुरुआत के तीन पन्ने सोने के पानी से लिखे हैं। दरअसल यह फारसी में लिखी रामायण का हिंदी अनुवाद है जिसे रामपुर रजा लाइब्रेरी ने प्रकाशित किया है। टाउनहॉल में लगे देश के पहले राष्ट्रीय संस्कृत पुस्तक मेले में पहली बार फारसी का ये अनुवादित पवित्र ग्रंथ पाठकों के लिए उपलब्ध है।
कौमी यकजहती का पैगाम देने के लिए वाल्मीकि की संस्कृत में लिखित रामायण को सन् 1715 में सुमेर चंद ने फारसी में अनूदित किया था। उन्होंने ही इसकी शुरुआत ‘बिस्मिल्लाह’ से की। तीन पन्ने में उन्होंने इसकी प्रस्तावना सोने के पानी से लिखी थी।
वर्ष 2011 में इस रामायण का अनुवाद हिंदी में प्रो. शाह अब्दुस्सलाम और डॉ. वकारुल हसन सिद्दीकी ने किया। देश के कुछ खास पुस्तकालयों में शुमार रामपुर रजा लाइब्रेरी ने इसे प्रकाशित किया।
ये दुनिया की इकलौती रामायण इस लिहाज से भी है कि इसमें चित्रों को भी शामिल किया गया है। तीन खंड में प्रकाशित इस रामायण में 258 चित्र हैं।