बढ़ती ऊर्जा जरूरतों के बीच पवन और सौर ऊर्जा से बिजली उत्पादन का दायरा बढ़ता जा रहा है। ..लेकिन अब यह बिजली, थर्मल पावर सेक्टर (कोयले से उत्पादित बिजली) के लिए चुनौती बनने लगी है। चूंकि पवन-सौर ऊर्जा की लागत चाहे जो आए, ग्रिड में सबसे पहले इसी बिजली को लिया जाना है।
इसके बाद उन तापीय बिजली परियोजनाओं की बिजली ली जाएगी, जो सस्ती बिजली देंगी। महंगी बिजली देनी वाली परियोजनाओं को शिड्यूल यानी उत्पादन के लिए तभी कहा जाएगा, जब मांग ज्यादा बढ़ेगी।
इससे जहां परियोजनाओं पर बिजली लागत कम करने का दबाव बढ़ने लगा है। वहीं ऐसा न होने की दशा में थर्मल बैकिंग में वृद्धि होने लगी है। इस नई चुनौती से देश के कई बिजलीघर तो जूझ ही रहे हैं, देश के सबसे बड़े 4760 मेगावाट वाले विद्युतगृह एनटीपीसी विंध्याचल को भी इससे जूझना पड़ रहा है।
खुद एनटीपीसी विंध्याचल के प्रमुख राजेश कुमार भटनागर भी इस बात को स्वीकारते हैं। आंकड़े बताते हैं कि बारिश के चलते मौजूदा वित्तीय वर्ष में इस परियोजना को एनसीएल के अलावा दूसरी कोल कंपनियों से कोयला लेना पड़ा। इससे परियोजना की बिजली लागत जो 1.68 के आस-पास थी।