जैन धर्म के आठवें तीर्थंकर भगवान चंद्रप्रभु की जन्मस्थली चंद्रपुरी में होने वाली यह लीला अपने आप में बेहद अनूठी है। इसमें हिंदू, मुस्लिम और जैन समाज का संगम नजर आता है।
चौबेपुर(वाराणसी)। देश और दुनिया को रामलीला का उपहार देने वाले बनारस की हर लीला का अंदाज अलग है। किसी ने पांच सौ साल की प्राचीनता काे सहेज रखा है तो किसी ने परंपराओं की थाती को। कुछ रामलीलाएं तो ऐसी भी हैं जो हर किसी को गंगा-जमुनी तहजीब का संदेश देती हैं। हम बात कर रहे हैं चौबेपुर क्षेत्र के चंद्रावती रामलीला की।
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जैन धर्म के आठवें तीर्थंकर भगवान चंद्रप्रभु की जन्मस्थली चंद्रपुरी में होने वाली यह लीला अपने आप में बेहद अनूठी है। इसमें हिंदू, मुस्लिम और जैन समाज का संगम नजर आता है। चंद्रावती रामलीला समिति की ओर से 1978 में शुरू हुई इस रामलीला में हिंदू, मुस्लिम और जैन धर्म के लोग भी सहयोग करते हैं। सबसे खास बात तो यह है पिछले 45 साल से रामलीला के पात्रों का मेकअप मुस्लिम परिवार ही करता आ रहा है। चंद्रावती की रामलीला में होने वाली नक्कटैया का आकर्षण ऐसा है कि दूर-दूर से लोग इसे देखने आते हैं। रामलीला के पात्रों का चयन रामलीला समिति के अध्यक्ष राजन तिवारी कमेटी के साथ करते हैं।
इस रामलीला की शुरुआत स्व. शोभा प्रसाद त्रिपाठी ने की थी। रामलीला की शुरुआत के समय से ही पात्रों का मेकअप गांव के मुस्लिम कल्लू करते आ रहे थे, लेकिन अब वे दुनिया में नहीं हैं तो उनके परिवार के ही सटृन नाई मेकअप करते हैं। गांव के निवासी व्यवसायी दीनानाथ जैन, विनय जैन, शैलेंद्र त्रिपाठी, कैलाश जैन अपना पूरा सहयोग देते हैं।