सितारा देवी ने कथक को दुनिया भर में चमकाया
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काशी की गलियों में रहने वाली धन्नो को आज पूरी दुनिया कथक क्वीन सितारा देवी के नाम से जानती है। कथक साम्राज्ञी ने दुनिया को कथक की बारीकियों से रूबरू कराया और विश्व फलक पर कथक को नई पहचान दिलाई। आठ नवंबर 1920 को बनारस के कबीरचौरा मोहल्ले में जन्मी धन्नो की जयंती का शताब्दी वर्ष पूर्ण हो चुका है और 101वीं जयंती आज मनाई जा रही है।
कथक साम्राज्ञी की बेटी जयंतीमाला मिश्रा ने बताया कि कथक साम्राज्ञी सितारा देवी को मात्र 16 साल की उम्र में ही गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने उनका नृत्य देखकर उन्हें कथक क्वीन के खिताब से नवाजा था। आज से सौ साल पहले जब कोई यह सोच नहीं सकता था कि एक शरीफ घराने की लड़की नाच-गाना सीखे।
तब उस दौर में नाना आचार्य सुखदेव ने पहली बार परिवार की परंपरा तोड़ी। किसी रूढ़ि को तोड़कर कला साधना में लीन होने का इनाम उन्हें बिरादरी के बहिष्कार के रूप में मिला। बहुत छोटी उम्र में ही उन्हें फिल्मों में काम करने का मौका मिला। कला के क्षेत्र में पहचान बनाने के लिए उन्होंने स्टेज शो करने का विचार किया और सन 1952 के बाद पीछे मुड़कर नहीं देखा। वो पहली ऐसी नृत्यांगना थीं जो उस दौर में लंदन गईं।