व्योमेश शुक्ला ने बताया कि हिंदी भाषा, नागरी लिपि के निर्माण और प्रसार में अनिवार्य भूमिका निभाने वाली 128 वर्ष पुरानी संस्था की हालत चिंताजनक है। संस्था पर काबिज लोग निजी लाभ के लिए मनमाने ढंग से संस्था की मूल्यवान चल-अचल संपत्ति का दुरुपयोग कर रहे थे। सभा की वाराणसी, नई दिल्ली और हरिद्वार स्थित अप्रतिम भौतिक और बौद्धिक संपदा तथा इसकी स्थापना के संकल्प ख़तरे में थे।
दवा व्यापारी को दे दिया है लीज पर
नागरी प्रचारिणी सभा परिसर के पूर्वी हिस्से में स्थित प्रकाशन-कार्यों के लिए बनाया गया ऐतिहासिक भवन एक दवा व्यापारी को लीज डीड के जरिये दस साल के लिए दे दिया गया है। उस भवन का उद्घाटन भारत के प्रधानमंत्री स्व. लालबहादुर शास्त्री ने किया था। उनके नाम का शिलापट्ट भी भवन के बाहर से हट गया है।
नागरी प्रचारिणी सभा की अतिथिशाला में कुछ लोगों का कब्जा है। उस अतिथिशाला के कमरे शोधार्थियों और साहित्यसेवियों तथा किसी के भी लिए उपलब्ध नहीं हैं। उसका कोई दाखिला रजिस्टर, बिल-बुक और ऑफिस आदि कुछ नहीं है।
नई दिल्ली के भूखंड का हो रहा व्यावसायिक इस्तेमाल
नई दिल्ली स्थित अतिथिशाला का भूखंड भारत सरकार ने सभा को दिया है, लेकिन उसका व्यावसायिक इस्तेमाल हो रहा है। पूरी बिल्डिंग ही किराये पर उठा दी गई है। खास बात यह है कि सभा की नई दिल्ली शाखा की बैलेंस शीट बैंक ऑपरेशन और आय-व्यय से जुड़ा कोई कागज सहायक निबंधक कार्यालय में जमा नहीं है।
व्योमेश शुक्ला ने बताया कि सभा की बौद्धिक संपदा को भी विदेश स्थित व्यक्तियों और संस्थाओं को चोरी-छिपे बेच देने की कोशिशें चल रही हैं। हिंदी भाषा, नागरी लिपि और भारतीय साहित्य की अनमोल संपदा लगभग 80 वर्ष पहले नागरीप्रचारिणी सभा द्वारा संकलित, संपादित और प्रकाशित ग्रंथ हिंदी शब्दसागर इसी अधिकृत सोसाइटी ने अपनी जनरल काउंसिल (साधारण सभा) की अनुमति के बगैर शिकागो विश्वविद्यालय के एक विभाग को महज 21 लाख रुपये में बेच दिया है।
अरसे से बंद चल रहा है प्रकाशन विभाग
नागरी प्रचारिणी सभा का मुद्रण और प्रकाशन विभाग अरसे से बंद है। अगर सभा द्वारा प्रकाशित सभी किताबें आज भी उपलब्ध हो जाएं तो हिंदी साहित्य के विद्यार्थियों और शोधार्थियों समेत बृहत हिंदी संसार न सिर्फ लाभान्वित होगा, बल्कि उनकी बिक्री से होने वाली आय से सभा की आर्थिक स्थिति भी सुधारी जा सकती है। वे किताबें आज अनुपलब्ध हैं और दूसरे प्रकाशक मौके का लाभ उठाकर, कॉपीराइट कानूनों का उल्लंघन करते हुए उन्हें चोरीछिपे छाप भी रहे हैं।
सभा का मुख्य भवन जिसमें हिंदी का सबसे पुराना आर्यभाषा पुस्तकालय है। यह सवा सौ साल पुरानी एक हेरिटेज इमारत है। इसको तत्काल सघन देखरेख और सरंक्षण की जरूरत है, जबकि रखरखाव के अभाव में वह जीर्णशीर्ण होकर गिरने की कगार पर है। भूतल पर उसका एक हिस्सा ढह भी गया है।
1893 में हुई थी स्थापना
नागरी प्रचारिणी सभा का योगदान बहुत बड़ा है। 1893 में स्थापित इस संस्था ने 50 साल तक हस्तलिखित हिंदी ग्रंथों की खोज का देशव्यापी अभियान चलाया। इन ग्रंथों के विधिवत पाठ-संपादन से तुलसी, सूर, कबीर, जायसी, रहीम और रसखान जैसे कवियों की प्रामाणिक रचनावालियां प्रकाशित हुईं और शिक्षित भारतीय समाज उनसे परिचित हुआ।