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ढह न जाए नेपाली मंदिर की दीवारें, बरसात ने बढ़ाई मुश्किलें

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भारत और नेपाल की मैत्री के प्रतीक रूप में स्थापित नेपाली मंदिर की दीवारें कभी भी ढह सकती हैं। बुधवार को हुई बारिश ने मंदिर व आश्रम में रहने वालों की चिंता बढ़ा दी है।
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दरअसल, बृहस्पतिवार की सुबह ललिता घाट स्थित नेपाली मंदिर में रहने वालों की जब आंखें खुली तो वह सहम गए। मंदिर के चारों तरफ खोदे गए 10 से 30 फीट के गड्ढों में बरसात का पानी भरा था और मंदिर की दीवार से सटी मिट्टी भी दरकनी शुरू हो गई। श्री काशी विश्वनाथ धाम के निर्माण के लिए मंदिर के चारों तरफ काफी गहरे गड्ढे खोदकर छोड़ दिए गए हैं। निर्माण के दौरान मशीनों के दबाव से मंदिर की दीवारों में पहले से ही दरार पड़ी हुई है। छह महीने से ललिता घाट पर भारी मशीनों से काम चल रहा है। इसके कारण लकड़ी से निर्मित मंदिर व आश्रम की दीवारों में कंपन होता है। सबसे ज्यादा खराब हालत मंदिर के वृद्धाश्रम की है। वृद्धाश्रम में रहने वाली महिलाओं को रात-दिन मंदिर की दीवारों के गिरने का डर बना हुआ है। आश्रम की तरफ तो गढ़्ढों की गहराई 40 फीट से भी ज्यादा है। मंदिर प्रबंधन का कहना है कि समय रहते इसको दुरुस्त नहीं किया गया तो भारी बरसात से आश्रम व मंदिर के ध्वस्त होने का खतरा बना हुआ है। रात भर अगर बरसात हुई तो मंदिर पूरी तरह से ढह जाएगा।
नेपाली मंदिर के महासचिव डॉ. गोपाल प्रसाद अधिकारी ने जिलाधिकारी कौशल राज शर्मा व मुख्य कार्यपालक अधिकारी सुनील कुमार वर्मा को पूरे मामले से अवगत कराया। इसके बाद मंदिर के आसपास भरे हुए पानी को निकालने का काम शुरू हुआ।
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दरक रही हैं अब मंदिर की दीवारें
महासचिव डॉ. गोपाल प्रसाद अधिकारी ने बताया कि नेपाली मंदिर की दीवारें पिछले छह महीने से लगातार दरक रही हैं। इसके संरक्षण के लिए नेपाल सरकार को पत्र लिखा गया था, लेकिन कोरोना संक्रमण के कारण पुरातत्व विभाग की टीम नहीं आ सकी। दीवारों की खस्ता हालत को देखते हुए मंदिर की धर्मशाला को खाली करा दिया गया है।
नेपालियों की आस्था का है प्रमुख केंद्र
नेपाल के पशुपति नाथ मंदिर का प्रतिरूप इस मंदिर में प्रवेश के बाद काशी में ही नेपाल का एहसास होता है। पशुपति नाथ का ये मंदिर नेपाली मंदिर के नाम से भी मशहूर है। मंदिर को लकड़ियों से ही निर्मित किया गया है। मंदिर के संरक्षण का काम भी नेपाल सरकार ही करती है। जलासेन घाट के बगल में स्थित मंदिर नेपालियों की आस्था का प्रमुख केंद्र है। मंदिर का निर्माण नेपाल के राजा राणा बहादुर शाह ने करवाया था। 1806 में उनकी मृत्यु के बाद बेटे राजा राजेन्द्र वीर विक्रम शाह ने इसका निर्माण 1843 में पूरा कराया। निर्माण नेपाल से आए कारीगरों ने किया था।
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