दालमंडी से निकाले साठे के जुलूस में मातम करते सिया मुस्लिम। अमर उजाला
वाराणसी। शहीदान-ए-कर्बला की याद में शनिवार को साठे का जुलूस उठाया गया। दालमंडी स्थित पुरानी अदालत से उठे दुलदुल और अमारी के जुलूस में अकीदतमंदों का हुजूम उमड़ा। अंजुमन-ए-हैदरी और अजादारों ने नौहा-मातम कर इमाम हुसैन को खिराज-ए-अकीदत पेश की। ‘या हुसैन अलविदा’ की सदाएं बुलंद हुईं। शिया घरों में मजलिसें हुईं और फातिहा पढ़ी गई। साठे के जुलूस के साथ ही दो माह आठ दिन का मातम खत्म हो गया। रविवार को ईद-ए-ज़हरा मनाई जाएगी। शिया जमात के लोग काले लिवास उतारकर रंग-बिरंगे कपड़े पहनेंगे और पकवान बनाएंगे। दावतों का दौर चलेगा।
दालमंडी स्थित शब्बीर सफदर के इमामबाड़े से जुलूस निकला। ‘या हुसैन’ की सदाएं बुलंद हुईं। जुलूस में अजादार नौहा-मातम करते हुए चल रहे थे। लियाकत अली और शराफत हुसैन नौहा पढ़ रहे थे। जुलूस में अमारी और दुलदुल के अलावा इमाम हुसैन की बेटी जनाब-ए-सकीना का कुर्ता, इमाम हुसैन के बेटे अली असगर का झूला सहित शहीदों से जुड़े सामान दर्शाए गए।
जुलूस के नई सड़क पहुंचने पर अजादारों ने जंजीर और कमा का मातम किया। छोटे बच्चे, युवा और बुजुर्ग भी जंजीरी मातम कर स्वयं को लहूलुहान कर इमाम हुसैन को अकीदत पेश कर रहे थे। मौलाना इरशाद अब्बास ने तकरीर पेश की। मौलाना नदीम अजगर ने काली महाल पर तकरीर करते हुए कहा कि यजीद की फौज शहीदों के परिवार के लोगों को गिरफ्तार कर कर्बला से शाम ले गई थी। यजीद से रिहाई के बाद इमाम हुसैन का परिवार वतन मदीने जा रहा है। इसी जुलूस को उस यात्रा के प्रतीक के रूप में दर्शाया जाता है। जुलूस के दौरान रास्ते भर लंगर चलता रहा। जुलूस नई सड़क, फाटक शेख सलीम, काली महाल और पितरकुंडा होते हुए दरगाह-ए-फातमान पहुंचकर ठंडा हुआ।