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लोगों के ताने को भूल बुना सफलता का तानाबाना

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शांति का नोबल पुरस्कार प्राप्त पाकिस्तान की मलाला यूसुफजई ने बच्चों की शिक्षा की खातिर जीवन की परवाह नहीं की और तालीबानियों से भिड़ गईं। इस घटना के बाद से मलाला दुनियाभर में बालिका शिक्षा का रोल मॉडल बन गईं। अपने शहर में भी कई ऐसी बेटियां है, जिन्होंने सामाजिक विरोध और तमाम कठिनाईयों के बाद भी अपनी सफलता की नई इबारत लिख रहीं हैं।
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गांव वालों के तानों ने दी ताकत
बेटियों को खेल के मैदान में क्यों भेजते हो, शॉर्ट स्कर्ट पहनकर जब घर की बेटी खेलती है तो अच्छा नहीं लगता। ये ऐसे सवाल थे, जो अक्सर लोग प्रियंका को खेलने जाते देखकर उनके पिता से करते थे। लेकिन बढ़ैनी के पास कंठीपुर गांव के एक साधारण किसान की बेटी एथलीट प्रियंका में खेल के प्रति ऐसा जुनून था, जिसके लिए वह गांव से एक किलोमीटर दूर नंगे पांव अभ्यास करने चली जाती थी। गांव और समाज के तमाम विरोध और ताने के बाद उन्होंने कामनवेल्थ गेम्स तक का सफर पूरा किया। प्रियंका ने 2009 में पहली बार 3000 मीटर बाधा दौड़ स्पर्धा में यूपी का प्रतिनिधित्व करते हए स्वर्ण पदक जीता। 2010 के कामनवेल्थ गेम्स में वो नौवें स्थान पर रहीं। खेलों में बेहतरीन प्रदर्शन की बदौलत वो रेलवे में कार्यरत हैं।
पैरों से छूई बुलंदियां
एकेटीयू में प्रशासनिक पद पर कार्यरत दल्लीपुर गांव की रानी वर्मा का जीवन संघर्षों से भरा है। 2001 में पंपिंग सेट पर पानी भरते समय पैर फिसलने के कारण दोनों हाथ मशीन के पट्टे में फंस गए थे। हाथ की नस और हड्डियों के बुरी तरह टूटने के कारण डॉक्टर ने हाथ काटने की सलाह दी। हादसे के बाद समाज ने उसके लाचारी का उपहास उड़ाया। रानी के सामने अब दो रास्ते थे पहला लाचारगी को अपने नियती मान ले। दूसरा अपने हौसलों से अपना रास्ता खुद बनाए। रानी ने अवरोधों से भरा दूसरा रास्ता अपनाया। इस रास्ते में चलने के लिए उनकी मां सूर्यपति देवी ने प्रेरित किया। अपनी सफलता की कहानी लिखने के लिए रानी ने पैरों को हाथ बना लिया। रानी ने पैरों से ही मुंबई आईआईटी से ग्रेज्युुएट एप्टीट्यूट टेस्ट इन इंजिनियरिंग (गेट) क्वालीफाई कर मेटलर्जी एंड मेटेरियल साइंस से एमटेक की डिग्री हासिल की। पढ़ाई के दौरान रानी कॉलेज में अपने जूनियरों को पढ़ाया भी करती थी।
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इतिहास
लड़कियों की शिक्षा के लिए आवाज उठाने के कारण तालिबान ने हमला कर घायल कर दिया था। मलाला ने 12 जुलाई 2013 को संयुक्त राष्ट्र महासभा के विशेष सत्र को संबोधित किया था। संयुक्त राष्ट्र ने प्रत्येक वर्ष 12 जुलाई को मलाला दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की थी।
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