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‘सरहदें नहीं होतीं ए गलियारा नहीं होता...’

Thu, 03 Nov 2016 01:49 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, वाराणसी
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मुनव्वर राणा को सम्मानित करते दीपक मधोक, जगदीप मधोक, प्रदीप मधोक ।
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जश्न-ए-इशरत मुशायरे में बुधवार की रात नफरतों को दूर करने और मोहब्बतों को बांटने के साथ ही मुल्क में कौमी एकता का पैगाम देने वाली गजलें पढ़ी गईं। सियासी चालें, सर्जिकल स्ट्राइक, महंगाई और भोपाल जेल से भागे कैदियों के एनकाउंटर पर भी शेर पढ़े गए। देर रात तक गजलों, शेरों पर खूब ठहाके लगे और तालियों की बौछार होती रही।
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शायर मुनौव्वर राणा के मंच पर आते ही तालियों की बौछार गूंजने लगी। भारत-पाकिस्तान पर फोकस शेर उन्होंने पढ़ा-सरहदें नहीं होतीं ए गलियारा नहीं होता/ अगर मां होती तो बंटवारा नहीं होता...। स्वच्छ भारत मिशन को लेकर शेर के जरिए बनारसी ढर्रे पर तंज भी कसे। उनके शेर की पंक्तियां इस तरह थीं- मुहब्बत में तुम्हें आंसू बहाना तक नहीं आया/ बनारस में रहे तुम पान खाना तक नहीं आया...। शायर वसीम बरेलवी के शेर इस तरह थे- आओ ए मुहब्बत है इसे दोनों निभाएं/ एक दिल में समा जाएं ये वो राज नहीं...।  जौहर कानपुरी ने शेर पढ़ा- जीतने को ए हुनर भी आजमाना चाहिए/भाइयों से जंग हो तो हार जाना चाहिए...।


इनके बाद नवाब अहमद ने गजल पढ़ी- बहुत खुलूस से मिलना हमें नहीं आता/ मुनाफित का तरीका भी हमें नहीं आता...। मेयार सनेही ने गजल पढ़ी-कश्ती का हौसला किसी तूफां से कम न था ...।  निकहत अमरोही ने गजल पढ़ी- आप ही कहिए हम लोग क्या हैं/ आपही का तो हम आइना हैं...।  शमीम गाजीपुरी, अबूजर नावेद, शबीना अदीब ने भी गजलों से माहौल बनाया। संचालन प्रतिमा सिन्हा ने किया। मुनौव्वर राणा को इशरत एवार्ड से नवाजा गया। सनबीम समूह के निदेशक दीपक मधोक, प्रदीप मधोक बाबा, अशोक जी अग्रवाल, सलीम राजा उपस्थित थे।
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मशहूर शायर मुनौव्वर राणा ने बुधवार को सर्जिकल स्ट्राइक के अलावा पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान से रिश्तों को लेकर खुलकर बात की। कहा कि साहित्य-कला के आदान-प्रदान के जरिए रिश्ते की कड़वाहट दूर की जानी चाहिए। हमें खिड़कियां-दरवाजे बंद नहीं करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि सियासत गजल की जबान नहीं समझती। फौज को सियासत से अलग रखना चाहिए। पाकिस्तान पर शेर पढ़ा- दिखाता है पड़ोसी मुल्क आंखें दिखाने दो/ कहीं बच्चे के गोशे से मां का गाल कटता है...। देश में मुसलिमों की दशा को लेकर वह बेहद चिंतित नजर आए। कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दलितों का दर्द तो दिखता है लेकिन मुसलिमों की आहें सुनाई नहीं देतीं। अवार्ड वापसी के सवाल पर भी उन्होंने अपनी भावनाएं साझा कीं। कहा कि बहुत लोगों ने पुरस्कार लौटाए लेकिन मैंने यह भी घोषणा की थी कि अब कभी कोई सरकारी पुरस्कार नहीं लूंगा। उन्होंने बताया कि 2006 में मैं पाकिस्तान एक मुशायरे में गया था। जब मेरा पढ़ने का नंबर आया तब अजान होने लगी। मैंने माइक पर कहा कि मेरे वतन में अजान के वक्त गजलें पढ़ी नहीं जातीं। इसकी वहां खूब तारीफ हुई।
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