वाराणसी। काशी विश्वनाथ से पशुपति नाथ का रिश्ता जोड़ने वाले विश्वविख्यात नेपाली मंदिर की दीवारें दरक रही हैं। गंगा तट पर स्थित नेपाली मंदिर के अस्तित्व पर संकट है और आननफानन में वहां से वृद्धाश्रम का कमरा खाली करा दिया गया है। वहीं मंदिर प्रशासन ने नेपाल सरकार से मंदिर के संरक्षण की गुहार लगाई है। माना जा रहा है कि काशी विश्वनाथ में निर्माण कार्य के दौरान भारी मशीनों के दबाव से मंदिर की दीवारों में दरारें पड़ गई हैं।
गंगा के किनारे ललिता घाट पर स्थित नेपाली मंदिर में रहने वाले दिन रात डर के साये में जिंदगी गुजार रहे हैं। काशी विश्वनाथ धाम में चल रहे निर्माण कार्य के दौरान भारी व बड़ी मशीनों के इस्तेमाल से नेपाली मंदिर में कंपन होता है। सबसे ज्यादा खराब हालत मंदिर के वृद्धाश्रम का है। वृद्धाश्रम में रहने वाली महिलाओं को रात-दिन मंदिर की दीवारों के गिरने का डर सताने लगा है। महिलाओं का कहना है कि रात और दिन काम के दौरान वृद्धाश्रम में तेजी से कंपन होने लगता है।
मंदिर व आश्रम की दीवारें जगह-जगह से दरकनी शुरू हो गई हैं। दीवारों की खस्ता हालत को देखते हुए मंदिर की धर्मशाला को खाली करा दिया गया है। मंदिर समिति ने नेपाल सरकार से मंदिर के संरक्षण के लिए गुहार लगाई है। नेपाली मंदिर के महासचिव डॉ. गोपाल प्रसाद अधिकारी ने बताया कि नेपाली मंदिर के संरक्षण के लिए नेपाल सरकार को पत्र लिखा गया है। मंदिर की दीवारें जगह-जगह से दरक रही हैं। समय रहते इनको संरक्षित नहीं किया गया तो किसी दिन बड़ा हादसा हो सकता है। वृद्धाश्रम को तो खाली करा लिया गया है।
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नेपालियों की आस्था का है प्रमुख केंद्र
शिव की नगरी काशी में ललिता घाट पर मिनी नेपाल बसता है। विश्वनाथ कॉरिडोर के पहले पाथवे के प्रवेश द्वार जलासेन घाट के बगल में स्थित भगवान पशुपति का मंदिर नेपालियों की आस्था का प्रमुख केंद्र है। नेपाल के पशुपति नाथ मंदिर का प्रतिरूप इस मंदिर में प्रवेश के बाद काशी में ही नेपाल का एहसास होता है। काशी में स्थित पशुपति नाथ का ये मंदिर नेपाली मंदिर के नाम से भी मशहूर है। मंदिर के संरक्षण का काम भी नेपाल सरकार ही करती है।
नेपाल के राजा राणा बहादुर शाह ने करवाया था मंदिर का निर्माण
पशुपतिनाथ मंदिर का निर्माण नेपाल के राजा राणा बहादुर शाह ने करवाया था। गंगा किनारे ललिता घाट की भूमि इस मंदिर के निर्माण के लिए चुनी और इसका निर्माण शुरू कराया। इसी दौरान 1806 में उनकी मृत्यु हो गई। मृत्यु के बाद उनके बेटे राजा राजेन्द्र वीर विक्रम शाह ने इस मंदिर का निर्माण 1843 में पूरा कराया। मंदिर का निर्माण नेपाल से आए कारीगरों ने किया था। मंदिर निर्माण में प्रयोग की गई लकड़ी को भी राजा ने नेपाल से ही मंगवाया था।
काठवाला है मंदिर
यह मंदिर लकड़ी का बना हुआ है इसलिए इसे काठवाला मंदिर भी कहते हैं। यह मंदिर टैराकोटा, लकड़ी और पत्थर के इस्तेमाल से नेपाली वास्तुशैली में बनाया गया है। यह रचना नेपाली कारीगरों की उत्कृष्ट शिल्प कौशल को बखूबी दर्शाती है। इसलिए यह वाराणसी के कुछ खास मंदिरों में से एक है। इस काठवाले मंदिर को छोटा खजुराहो भी कहा जाता है। ऐसा इसलिए कहा जाता है क्योंकि इस लकड़ी के मंदिर में जो मूर्तियां खुदी हुई हैं वे खजुराहो मंदिर की तरह ही हैं।
एक बार पहले हो चुका है विवाद
काशी विश्वनाथ धाम निर्माण के आरंभ में 2018 में नेपाली मंदिर को हटाने के मामले में नेपाल तक मुद्दा उठाया गया था। नेपाली सरकार ने पीएम मोदी से नेपाल यात्रा के दौरान इस मुद्दे पर बात की थी। इसके बाद स्थानीय प्रशासन हरकत में आया और नेपाली मंदिर को संरक्षित करने का आश्वासन दिया गया था।
नेपाल का पुरातत्व विभाग करता है मंदिर की देखरेख
नेपाली मंदिर ट्रस्ट के महासचिव गोपाल प्रसाद अधिकारी ने बताया कि इस ऐतिहासिक मंदिर की देखरेख नेपाल के पुरातत्व विभाग के जिम्मे है। यहां नियुक्त आठ कर्मचारियों को नेपाल सरकार वेतन देती है। मंदिर ट्रस्ट के पदेन संरक्षक भारत में नेपाल के राजदूत होते हैं। मंदिर परिसर में ही वृद्धाश्रम और धर्मशाला भी है। धर्मशाला में नेपाली युवा रहकर पढ़ाई करते हैं।
कई नेपाली नेता ले चुके हैं शरण
नेपाल में समय-समय पर चले आंदोलनों के दौरान तमाम नेपाली नेताओं को नेपाली मंदिर में ही शरण मिली। वीपी कोइराला, गिरिजा प्रसाद कोइराला, कृष्ण प्रसाद भट्टराई सरीखे नेता नेपाल से वाराणसी आने पर मंदिर में ही रहते रहे। महाराजा ज्ञानेंद्र शाह और वीरेंद्र शाह, नेपाल के प्रथम राष्ट्रपति रामबरन यादव भी इस मंदिर में आकर ठहर चुके हैं।