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तेलंगाना सीएम ने मात्र 13 माह में बदल डाली दो हजार लोगों की जिंदगी

Wed, 14 Jun 2017 02:04 PM IST
amarujala.com- Written by: प्रदीप मिश्र
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396 बीपीएल परिवारों को हैदराबाद के बीचोबीच अच्छे घर बनवाकर दिए - फोटो : self
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रोटी, कपड़ा और मकान जीवन की बुनियादी आवश्यकता है। इनमें से एक अदद घर को लेकर तमाम लोग जिंदगी भर सोचते और सपने देखते रहते हैं। तेलगांना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव ने केवल 13 महीने में करीब दो हजार लोगों को उनका खुद का मकान देकर खुशहाली ला दी है।
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उन्होंने 396 बीपीएल परिवारों को हैदराबाद के बीचोबीच घर बनवाकर दिए हैं। इन मकानों में दो हजार परिवार रह रहे हैं। 58.5 वर्ग मीटर क्षेत्रफल वाले इन घरों में दो कमरे, दो बाथरूम और ड्राइंग रूम के साथ किचन तो है ही, ग्राउंड फ्लोर वालों के लिए एक ओपन लॉबी भी है।

9.48 लाख रुपये की लागत से बने ये सभी मकान मुफ्त दिए गए हैं। पत्र सूचना कार्यालय की वाराणसी इकाई की ओर से 11 से 17 जून तक के दौरे पर आए काशी के पत्रकारों के दल ने मंगलवार को दूसरे दिन इन घरों को देखा।
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उत्तर प्रदेश की तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती के समय लगभग हर जिले में बनाए गए कांशीराम आवासों से इनकी तुलना की जाती रही। तीन मंजिल के इन मकानों की गुणवत्ता को अब तक कोई सवाल बड़े तौर पर नहीं उठा है।

जिन लोगों को घर दिए गए हैं, उनमें 271 अनुसूचित जाति, 31 अनुसूचित जनजाति और अन्य में ओबीसी और अल्पसंख्यक समुदाय के हैं। चन्द्रशेखर राव की सरकार तेलंगाना के सभी 31 जिलों में ऐसे मकान बनाने जा रही है। अकेले हैदराबाद में एक लाख घर बनाए जाएंगे।
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मकान पाने वाले सभी मजदूर

हैदराबाद के बीचोबीच अच्छे घर - फोटो : अमर उजाला
तेलंगाना सरकार के आवास, समाज कल्याण और आदिवासी कल्याण विभाग की ओर से दिए गए धन से इनका निर्माण किया गया है। कुल 33 ब्लॉक में बने मकानों के बीच चौड़ी सड़कों के अलावा सभी सुविधाएं हैं।

लोगों का जीवन कुछ ऐसे बदला कि ज्यादातर घरों में टीवी और रेफ्रिजरेटर ही नहीं, सोफा सेट और मॉड्यूलर किचन तक हैं। डिप्टी एग्जीक्यूटिव इंजीनियर बी रघुनाथ बताते हैं कि 396 घरों में औसतन पांच लोगों का परिवार रहता है।

ऐसे ही एक मकान की स्वामी लक्ष्मी बताती हैं कि झुग्गी में रहते हुए हमने सोचा ही नहीं था कि उन्हें सिर छिपाने के लिए कभी छत भी नसीब होगी।

दरअसल, यहां मकान पाने वाले सभी 396 लोग रोजाना मजदूरी करने वाले थे, कुछ चाय-समोसा बेचते थे और कई कबाड़ की खरीद करते थे। जिस जमीन पर ये लोग रह रहे थे, वह सरकारी संक्रामक रोग अस्पताल के स्वामित्व में थी। 
 
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