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शिक्षक दिवस पर विशेष: गुरु-शिष्य पर क्या कहते हैं वाराणसी के शिक्षाविद

Wed, 05 Sep 2018 03:45 PM IST
न्यूज डेस्क,अमर उजाला,वाराणसी
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बीएचयू के कुलपति, बीएचयू आईआईटी के निदेशक और काशी विद्यापीठ के कुलपति - फोटो : amar ujala
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गुरु की महिमा अनंत है। शिष्य को मंजिल की राह बताने वाला गुरु ही है। शिष्य गुरु पर बलिहारी है। यही गुरु-शिष्य परंपरा का मूल भाव है। तकनीक के विकास साथ जानकारियों के स्रोत बढ़े हैं। शिष्य भी अब जानकारी के लिए गुरु से ज्यादा गुगल पर सर्च करते हैं। शिक्षाविद मानते हैं कि गुरु-शिष्य के बीच संवाद कम हो रहा है। ऑनलाइन रिसोर्स बढ़ने से पुरानी परंपरा बदल रही है। इसके बावजूद शिक्षक का महत्व बना रहेगा। शिक्षक सिर्फ ज्ञान ही नहीं देता, बल्कि व्यक्तित्व निर्माण भी करता है। जीवन मूल्यों की शिक्षा भी देता है। 
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बीएचयू कुलपति प्रो. राकेश भटनागर कहते हैं कि समय बदलने के साथ ही परंपराओं में भी बदलाव आता जा रहा है। वर्तमान समय में छात्र-छात्राओं में असीम ऊर्जा है, बस उन्हें सही मार्गदर्शन की जरूरत है, जिससे कि वह विकास के पथ पर अग्रसर हो सकें। आज चाहे कितनी भी जिम्मेदारियां हों, समय-समय पर गुरुओं का मार्गदर्शन लेता रहता हूं, उसके बाद सुखद अनुभूति होती है। 

आईआईटी बीएचयू के निदेशक प्रो. पीके जैन कहते हैं कि  गुरु-शिष्य परंपरा का जो पहले भाव था, वह अब भी है, लेकिन इसमें थोड़ी सी कमी आई है। पहले जब छात्र को विषयों से जुड़ी कोई समस्या रहती थी तो वह शिक्षक के पास जाता था लेकिन अब ऑनलाइन रिसोर्स बढ़ने से इस तरह का संवाद कम हुआ है। बदलते परिवेश में यह जरूरी है कि शिक्षक और छात्रों के बीच परस्पर संवाद जारी रहे। ,  
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काशी विद्यापीठ के कुलपति प्रो. टीएन सिंह कहते हैं कि  गुरु वही जो शिष्य को सही रास्ता, सही आचरण व व्यवहार सिखाए। वर्तमान समय में शिक्षकों का दायित्व बढ़ गया है क्योंकि समाज में मूल्यों की कमी हो गई है। शिक्षक ज्ञान के साथ व्यक्तित्व निर्माण और मूल्यों की शिक्षा दे। गुरु ऐसा हो जिसमें छात्र को अपना प्रतिबिंब दिखे। वो गुरु के अंदर स्वयं को ढूंढे। आज के रोल मॉडल से रूप में शिक्षकों की जरूरत है, तभी यहां की गुरु शिष्य परंपरा कायम रहेगी। 
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