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शिक्षक और स्नातक एमएलसी: वाराणसी मंडल की दोनों सीटों पर भाजपा की हार, जीत का अंतर बढ़ा; आत्ममंथन की चुनौती

Fri, 30 Oct 2026 05:11 AM IST
Aman Vishwakarma राहुल दुबे, अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।

सार

वाराणसी मंडल की शिक्षक और स्नातक, दोनों एमएलसी सीटों पर भाजपा को हार का सामना करना पड़ा। स्नातक सीट पर हार का अंतर भी बढ़ा। बैठकों, संपर्क अभियानों और बड़े नेताओं के मार्गदर्शन के बावजूद भाजपा प्रत्याशी जीत नहीं सके। अब परिणामों के बाद संगठन की रणनीति और प्रत्याशी चयन पर सवाल उठ रहे हैं। भाजपा के सामने आत्ममंथन की चुनौती है।
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केदारनाथ सिंह और आशुतोष सिन्हा। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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विधानसभा चुनाव से पहले वाराणसी मंडल की शिक्षक और स्नातक एमएलसी सीटों पर मिली हार ने भाजपा के सामने संगठनात्मक तैयारियों की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। चुनाव से पहले पार्टी ने बूथ स्तर तक बैठकें कीं। कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने के लिए बड़े नेताओं के जरिये रणनीति बनाई गई, इसके बावजूद दोनों सीटें सपा के पास चली गईं। स्नातक सीट पर जीत का अंतर 2020 के मुकाबले काफी बढ़ गया, जबकि शिक्षक सीट पर भाजपा के टिकट पर उतरे डॉ. प्रमोद मिश्र अपने पिछले चुनाव के मतों को भी नहीं बचा सके।

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पिछली बार से 16 हजार मतों का बढ़ा अंतर
साल 2020 में सपा के आशुतोष सिन्हा ने केदारनाथ सिंह को 3850 मतों से हराया था। जबकि इस बार आशुतोष सिन्हा ने केदारनाथ सिंह को 19932 वोटों से हराया।यानी पिछली बार के मुकाबले दोनों प्रत्याशियों के बीच अंतर 16082 मत बढ़ा। यह परिणाम केवल हार-जीत तक सीमित नहीं है, बल्कि इस सवाल को भी सामने रखता है कि पांच साल में भाजपा स्नातक मतदाताओं के बीच अपना समर्थन क्यों नहीं बढ़ा सकी।

स्नातक एलएमसी चुनाव में रोजगार, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी, भर्ती प्रक्रियाओं में देरी, प्रश्नपत्र लीक और उच्च शिक्षा से जुड़े सवाल इस वर्ग के बीच चर्चा में रहते हैं। भाजपा के लिए यह समीक्षा करना अहम होगा कि उसके प्रत्याशी ने शिक्षित युवाओं और अन्य पंजीकृत स्नातकों के साथ मुद्दों पर कितना संवाद किया।

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हारे हुए प्रत्याशी को भाजपा ने बनाया प्रत्याशी
शिक्षक सीट का गणित भाजपा के लिए एक अलग चुनौती रखता है। 2020 में लाल बिहारी यादव ने सपा प्रत्याशी के रूप में निर्दलीय उम्मीदवार रहे डॉ. प्रमोद मिश्र को हराया था। इस बार डाॅ. प्रमोद मिश्र भाजपा के टिकट पर मैदान में उतरे, लेकिन उन्हें अपेक्षित लाभ नहीं मिला। 2020 में उन्हें 6830 मत मिले थे और इस बार उन्हें पिछली बार से भी कम 6597 वोट मिले।

दूसरी ओर लाल बिहारी यादव को 11612 मत मिले। उन्होंने पिछली बार के मुकाबले अपना समर्थन बढ़ाया। ये आंकड़े भाजपा के लिए कई सवाल छोड़ते हैं। पार्टी का चुनाव चिह्न और संगठनात्मक समर्थन मिलने के बाद भी प्रमोद मिश्र अपने पिछले चुनाव के मतों की बराबरी क्यों नहीं कर सके, क्या शिक्षक समुदाय के बीच उनकी व्यक्तिगत पकड़ पर्याप्त नहीं थी, क्या पार्टी शिक्षक मतदाताओं के मुद्दों को प्रभावी ढंग से उठा सकी।

कार्यकर्ताओं की नाराजगी और मतों का बंटवारा भी जांच के दायरे में
स्थानीय राजनीतिक चर्चाओं में कार्यकर्ताओं की नाराजगी, प्रत्याशी चयन और संगठन के भीतर तालमेल की कमी को भी संभावित कारण बताया जा रहा है। अब भाजपा बूथवार मतदान, कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियों और चुनाव के दौरान उनकी सक्रियता का आकलन करेगी। भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने बताया कि शिक्षक सीट पर चेत नारायण सिंह निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में मैदान में थे। उन्हें पहली वरीयता में 3111 और अंतिम गणना में 3471 मत मिले। उनकी मौजूदगी ने चुनावी समीकरण को प्रभावित किया हो, ऐसा हो सकता है।

55 घंटे चली स्नातक एमएलसी की मतगणना, 2020 में चली थी करीब 41 घंटे
वाराणसी खंड स्नातक विधान परिषद सीट की मतगणना में करीब 55 घंटे का समय लगा। पहड़िया मंडी स्थित मतगणना स्थल पर मतपत्रों की छंटाई, बंडल बनाने और वरीयता के आधार पर मतों की गणना की प्रक्रिया पूरी होने के बाद अंतिम परिणाम घोषित किया गया। जबकि वर्ष 2020 में स्नातक सीट की मतगणना करीब 41 घंटे चली थी। उस समय 21 प्रत्याशियों के मतों की गणना और दूसरी वरीयता के मतों के हस्तांतरण के बाद आशुतोष सिन्हा विजयी हुए थे।

स्नातक एमएलसी मतदाता सूची में महिलाओं की संख्या पुरुषों से आधी से भी कम
वाराणसी खंड स्नातक एमएलसी चुनाव की मतदाता सूची में पुरुषों और महिलाओं की संख्या के बीच बड़ा अंतर सामने आया है। आठ जिलों में फैले इस निर्वाचन क्षेत्र में 193901 पुरुष और 94652 महिला मतदाता पंजीकृत थे। कुल मतदाताओं की संख्या 288553 थी। चुनाव के दौरान कुल 118611 मतदाताओं ने वोट डाले। मतदान प्रतिशत 41.11 रहा।

अभी हार के विषय पर कुछ नहीं बोलूंगा। अभी कुछ नहीं बता सकता। - राम सकल, जिलाध्यक्ष, भाजपा।
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परिणाम हमारे पक्ष में नहीं रहा। हमारे प्रत्याशियों के चयन में देरी इसकी एक बड़ी वजह रही। इस चुनाव में एक एक मतदाता के घर जाकर वोट बनवाना पड़ता है। इसलिए हमारे प्रत्याशियों को समय नहीं मिल सका। - अशोक चौरसिया, क्षेत्रीय अध्यक्ष, काशी क्षेत्र
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