वाराणसी। टमाटर की खेती इस बार किसानों मुनाफा देने के बजाय घाटे की खेती बन गई। कच्चा माल और कोरोना कर्फ्यू में किसानों को मजबूरन मंडियों में अपनी फसल औने पौने दाम में बेचना पड़ रहा है। जबकि कई किसान हताश होकर खेतों में ही अपनी तैयार फसल छोड़ दे रहे हैं। कई ने खड़ी फसल ट्रैक्टर चला दिया। भाव गिरने से टमाटर बेचकर लागत भी निकाल पा रही है। किसानों के पास कोई दूसरा विकल्प भी नहीं कि टमाटर का कोई दूसरा उत्पाद तैयार कर सकें।
जिले में सब्जी के खेती में टमाटर की खेती फायदे की खेती मानी जाती थी। लेकिन भरपूर पैदावार के बाद भी टमाटर बेचकर किसानों को फायदा नहीं निकल पा रहा है। जो टमाटर पहले 15 से 20 रुपये प्रति किलो की दर से थोक में बिकता था, वह अब चार से पांच रुपये किलो की दर से बिक रहा है। हालत ये हैं कि किसान टमाटर की तोड़ाई बंद कर दिए हैं। वहीं कई किसान अपनी फसल ही नष्ट कर दिए हैं।
केस-1
बड़ागांव के मधुमक्खियां गांव के किसान त्रिलोकी नाथ ने चार बीघा में तीन लाख रुपये की लागत से टमाटर की खेती की है। मई के पहले सप्ताह से रोजाना 25 से 26 क्विंटल तक टमाटर का उत्पादन हो रहा है। जिसके मंडी में अच्छे भाव नहीं मिल रहे। त्रिलोकी अच्छे भाव के लिए जौनपुर के मडियाहू, गाजीपुर, आजमगढ़ की मंडियों भी अपना उत्पाद भेज रहे हैं मगर कोरोना कर्फ्यू के चलते अच्छा भाव नहीं मिल पा रहा है।
केस-2
जैविक विधि से 15 बिस्वा टमाटर खेती करने वाले फूलपुर के किसान ओमप्रकाश का कहना है। जैविक उत्पाद होने से अच्छा भाव मिलने की उम्मीद थी। अप्रैल में कुछ दिनों तक 10 से 20 रुपये किलो की दर से पिंडरा मंडी में टमाटर बिका। मगर कोरोना कर्फ्यू की वजह दो से चार रुपये में माल बेचना पड़ रहा है। ऐसे में टमाटर की खेती घाटे की खेती साबित हो रही है।
केस-3
15 बिस्वा में खेती करने संतोष कुमार, 10 बिस्वा में बृजेश कुमार, आठ बिस्वा में अजय कुमार और छह बिस्वा में टमाटर की खेती करने वाले विजय कुमार का कहना है कि अच्छा भाव न मिलने से टमाटर मंडी ले जाने के बजाय खेत भी छोड़ देना ही अच्छा है। तोड़ाई, भाड़ा और पल्लेदारी देने के बाद कुछ बचता ही नहीं है। संतोष और बृजेश ने कई बिस्वा की तैयार फसल पर जुताई करवा दी।