असि नदी के पुनर्जीवन के लिए तकनीकी सर्वे का काम शुरू हो गया है। गंगा और उसकी सहायक नदियों के संरक्षण के लिए गठित देश के सातों भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) के कोआर्डिनेटर प्रो. विनोद तारे के नेतृत्व में आई टीम ने असि नदी से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर जानकारी जुटाई। नदी में गिरने वाले नालों के अलावा शहर में जलदोहन और निकासी पर आधारित योजनाओं के बारे में भी जानकारी ली गई। प्रो. तारे ने ‘अमर उजाला’ को बताया कि अभी अध्ययन किया जा रहा है ताकि बुनियादी समस्याओं के समाधान के साथ आगे बढ़ा जा सके।
नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा की ओर से असि नदी के पुनरुद्धार पर पायलट प्रोजेक्ट को मंजूरी मिलने के बाद असि नदी के कायाकल्प के लिए पहली बार तकनीकी सर्वे आरंभ हुआ है। सर्वेक्षण का काम देश के जानेमाने टेक्नोक्रेट प्रो. विनोद तारे को सौंपा गया है। उनके नेतृत्व में आई टीम ने दो दिन तक काशी में प्रवास कर जल निगम, जायका और गंगा प्रदूषण नियंत्रण इकाई की ओर से किए जा रहे कार्यों और इनसे जुड़ी योजनाओं के बारे में जानकारी ली। शनिवार को दिल्ली रवाना होने से पहले प्रो. तारे ने बताया कि असि नदी की पारिस्थितिकी का जायजा लिया गया है।
बताया कि बनारस में गंगा और सहायक नदियों को प्रदूषणमुक्त करने की दिशा में कौन-कौन एजेंसियां काम कर रही हैं, किन संस्थानों का कहां-कहां प्रोजेक्ट चल रहा है, कहां से कहां तक पाइप लाइनें बिछाई गई हैं और सीवर लाइनें कहां से निकली और कहां जोड़ी गई हैं, इसका अध्ययन किया जा रहा है। इसके अलावा शहर में कितना भूजल का दोहन किया जा रहा है और कहां-कहां से कितना पानी निकल रहा है। इसकी जानकारी जुटाई जा रही है।
उन्होंने कहा कि इसके आकलन के बिना हम असि नदी के कायाकल्प के लिए आगे नहीं बढ़ सकते। उन्होंने चिंता जताई कि तमाम कोशिशों के बावजूद कार्यदायी संस्थाओं ने हाथ खड़े कर दिए। फिलहाल अपेक्षित सूचनाएं नहीं मिल सकी हैं। उल्लेखनीय है कि असि का पायलट प्रोजेक्ट बीएचयू के महामना मालवीय रिसर्च सेंटर फॉर गंगा ने तैयार किया है। प्रो. तारे इस सेंटर के सलाहकार भी हैं।