बीएचयू के सेमिनार हॉल में बुधवार को हिंदुत्व और हिंद स्वराज से क्रांति, सुधार और समन्वय पर विशेष व्याख्यान हुआ। गांधी और सावरकर के विचारों में असमानता के बावजूद दोनों का उद्देश्य एक ही बताया। वहीं, कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी ने कहा कि विश्वविद्यालयों में विद्यार्थियों को केवल एकतरफा शिक्षा न दी जाए। उनके अकादमिक सहभागिता को सीमित न रखते हुए, हर विचार और मतों के बीच संवाद, चर्चा और विचारों को साझा करना चाहिए। उन्होंने कई विभागों में ऐसे कार्यक्रमों को नियमित परंपरा के रूप में विकसित करने का सुझाव दिया। आगे कहा कि अकादमिक विमर्श में ‘गुरु’ और ‘शिष्य’ की स्थायी भूमिकाएं नहीं होतीं, बल्कि प्रश्न, आत्मचिंतन और विचार-विमर्श का महत्त्व होता है। कई अलग-अलग मतों और दृष्टिकोणों के बीच विचारों को साझा किया जाना चाहिए।
गांधी और सावरकर के वैचारिक मतभेदों पर चर्चा
अंग्रेजी शोधकर्ता मंच ‘अन्वेषण’ की ओर से हुए इस कार्यक्रम में आईआईएएस के पूर्व निदेशक प्रो. मकरंद परांजपे ने कहा कि महात्मा गांधी और वीडी सावरकर के बीच वैचारिक मतभेदों की चर्चा की। कहा कि उनके मानवीय पक्ष के साथ आलोचना की दृष्टि से समझना होगा। गांधी और सावरकर से जुड़े सामाजिक सुधार के प्रश्नों जिसमें धार्मिक स्थलों तक पहुंच और जाति आधारित प्रथाओं को बताया। गांधी की हिंद स्वराज और सावरकर की द इंडियन वॉर ऑफ इंडिपेंडेंस ऑफ 1857 का प्रकाशन 1909 में हुआ था। दोनों कृतियों में भारत की स्वतंत्रता और ब्रिटिश शासन के प्रतिरोध को लेकर अलग-अलग मत सामने आते हैं। हालांकि उनकी पुस्तक का एक ही उद्देश्य है। संचालन ‘अन्वेषण’ के समन्वयक प्रो. देवेंद्र कुमार, स्वागत वक्तव्य प्रो. संजय कुमार और समन्वयक प्रो. पीएस द्विवेदी ने धन्यवाद ज्ञापित किया।