ट्रांसपोर्टरों की सुविधा के लिए वाराणसी विकास प्राधिकरण (वीडीए) की ओर से ट्रांसपोर्ट नगर बसाया जाना था। करीब डेढ़ दशक बाद भी परियोजना परवान नहीं चढ़ सकी। जबकि इसके लिए अब तक तकरीबन 48 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं। मुआवजे व अन्य मामलों को लेकर किसानों ने विरोध शुरू किया और हाईकोर्ट चले गए। इसके बाद ट्रांसपोर्ट नगर खटाई में पड़ गया।
वीडीए ने ट्रांसपोर्ट नगर बसाने की कवायद वर्ष 2000 में शुरू की थी। 82 हेक्टेयर जमीन पर बसने वाली ट्रांसपोर्ट नगर के लिए 48 करोड़ रुपये खर्च भी किए गए। इसके लिए मोहनसराय, बैरवन, मिल्कीचक और करनाडाड़ी गांव के किसानों की जमीन अधिग्रहित की जानी थी। वर्ष 2003 में इन गांवों के 1194 किसानों की जमीन चिह्नित की गई। इसमें से 781 किसानों ने सहमति भी दे दी। 771 को मुआवजा भी दिया जा चुका है। कुछ किसान नेताओं का आरोप है कि इसमें कई किसान ऐसे हैं जिनकी जमीन वीडीए ने अपने नाम करा ली है।
हालांकि उक्त जमीन पर अभी भी किसान खेती करते हैं। ऐसे किसानों को कृषि संबंधी सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिलता। कुछ ने मुआवजा बढ़ाने की मांग की तो कई किसान अपनी जमीन मांगने लगे। विवाद बढ़ा तो किसान हाईकोर्ट चले गए। मामले में वीडीए के अधिकारी मुंह खोलने को तैयार नहीं हैं। उच्च न्यायालय में किसानों की पैरवी कर रहे वीरेंद्र उपाध्याय ने बताया कि यहां के किसान छोटे काश्तकार हैं। ट्रांसपोर्ट नगर के नाम पर उनकी जमीन ली गई तो वे भुखमरी के कगार पर पहुंच जाएंगे।