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खास बातचीत : वैज्ञानिकों को चिड़ियाघर का नहीं, जंगल का जानवर बनाना है..., बोले- BHU के VC प्रो. सुधीर

Mon, 04 Nov 2024 09:30 AM IST
अमन विश्वकर्मा हिमांशु अस्थाना, अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।

सार

Varanasi News : काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में नए कुलपति के चयन की प्रक्रिया जारी हो गई है। वहीं, वर्तमान कुलपति ने बीएचयू की व्यवस्थाओं और कार्यप्रणाली पर संतुष्टि जताई। उन्होंने शोध सहित लैब मशीनों के इस्तेमाल को लेकर भी अपनी बात रखी।
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बीएचयू के कुलपति प्रो. सुधीर कुमार जैन। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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बीएचयू के कुलपति प्रो. सुधीर कुमार जैन के कार्यकाल का अंतिम साल चल रहा है। नए कुलपति के चयन की प्रक्रिया भी जारी है। प्रो. जैन ने अमर उजाला संवाददाता हिमांशु अस्थाना से विशेष बात की। उन्होंने कई गंभीर आरोपों के जवाब भी दिए। साथ ही अस्पताल की बदहाली पर निराशा जताई। रिसर्च के लिए लाई गईं करोड़ों रुपये कीमत की मशीनों के इस्तेमाल न होने की बात भी स्वीकार की है। पेश है बातचीत के अंश-

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प्रश्न- आईआईटी से निकलकर यूनिवर्सिटी सिस्टम में आकर आप खुद को कितना परसेंट सफल मान रहे हैं, क्या कमियां रह गईं जिसको सुधारना बाकी है ?
उत्तर- विश्वविद्यालय की व्यवस्था मेरे लिए बिल्कुल नई थी और इसे लेकर आश्वस्त भी नहीं था। लेकिन, तीन साल बाद उम्मीद से ज्यादा काम किया। अभी भी काफी कुछ करना बाकी है।
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प्रश्न- कुलपति पद संभालने के बाद आपने पहले पत्रकार वार्ता में कहा था कि फंड लाएंगे, उसके कई तरीके हैं। कितना फंड जुटा ? 
उत्तर- तीन साल में आय 50-60 प्रतिशत बढ़ी है। 2020 में 1414 करोड़ के मुकाबले 2024 में 2293 करोड़ की आय हुई। तीन तरह से पैसे जुटे। सरकारी ग्रांट, रेंट, ट्यूशन फीस और डोनेशन की रकम बढ़ी है।

प्रश्न- ये फंड कैसे जुटाए गए ?
उत्तर- दुकानों के बकाया रेंट, बिजली के बिल, हाॅस्टल फीस को रिकवर कराया। कैंपस में दुकानों के रेंट बढ़ाए। जिन्होंने किराया नहीं दिया था, उनको चिन्हित करके वसूली की गई। पहले किराया से छह से सात करोड़ रुपये की आय होती थी, 23-24 में 16 करोड़ की आय रही है।

कचरा बेचकर कमाये 8 करोड़ रुपये
कई विभागों में कई क्विंटल जंक इक्विपमेंट को हटाया गया। 50 हजार स्क्वायर फीट जगह को खाली किया गया। कचरा निकाला और स्क्रैप में बेचने से आठ करोड़ रुपये मिले। 10 साल पहले कंडम हो चुकीं 50 पुरानी कारों को बेचा। 

प्रश्न- तीन साल में दान में कितना फंड मिला ? 
उत्तर-  डोनेशन से मिली आय को 80 लाख से 3.75 करोड़ रुपये तक पहुंचाया गया। हमने मुंह खोलकर पैसा मांगना शुरू किया। पहले तो कहते ही नहीं थे कि हमें पैसे चाहिए। अब दान देने में बार्गेनिंग और डिस्कसन का काम खत्म। पांच लाख की स्काॅलरशिप बना दी है। इसमें छात्र को 25 हजार रुपए देने ही होंगे।

प्रश्न- आपने अब तक कितनी स्काॅलरशिप आपने शुरू कराई ?
उत्तर-  ढाई साल में 300 स्कॉलरशिप बनाई गई। 200 पर एमओयू साइन होने वाले हैं। 100 पर डोनर से बातचीत चल रही है। बीएचयू में कुल 36 हजार छात्र--छात्रा हैं। कोशिश है कि 20-25 प्रतिशत छात्रों को स्काॅलरशिप का फायदा मिल पाए।

प्रश्न- न्यू विश्वनाथ मंदिर में दान का कितना पैसा मिला, उन पैसों का क्या इस्तेमाल हो रहा है।
उत्तर- पहले तो  मंदिर के दानपात्र में सिक्के डाते जाते थे। फिर बोरियों और ड्रमों में भरकर पैसों को कोठरियों में फेंक दिया जाता था। कभी--कभी निकलकर ये बैंक जाते थे। ये पैसे न ब्याज देते थे और न ही स्काॅलरशिप। बोरियों को खुलवाकर सिक्कों को गिनवाया। हर सप्ताह बैंकों के फिक्स डिपोजिट में 7.5 प्रतिशत ब्याज दर से जमा कराया गया। पहले हर सप्ताह 40 लाख की आय होती थी और अब 185 लाख तक चला गया। मुझे इसकी साप्ताहिक रिपोर्ट आती है कि कितना पैसा बैंक से आया है। 

प्रश्न- आईओई के नाम पर कितने पैसे बांटे गए ? उसके दुरुपयोग के कई गंभीर आरोप लग रहे हैं।
उत्तर- आईओई यानी कि इंस्टीट्यूट ऑफ एमिनेंस के 1000 करोड़ में से अब तक 600 करोड़ रुपए बांटे गए। दुरुपयोग का पता नहीं, लेकिन काम समग्रता के साथ किया जा रहा है।

प्रश्न- आईओई का उद्देश्य था रिसर्च बढ़ाना और बीएचयू को दुनिया की टाॅप-5 यूनिवर्सिटी में लाना, लेकिन तीन साल में हमारी रैंकिंग में कोई सुधार नहीं हुए।
उत्तर-  ये काम केवल अकेले रिसर्च से नहीं होगा, बल्कि पूरी व्यवस्था को ऊपर लाना होगा। 486 करोड़ में इक्विपमेंट आए और बिल्डिगें बनीं हैं। रिसर्च के लिए बिल्डिंग का इ्रपूमेंट, लैब के सामान, व्यवस्था, लैपटॉप, मेज, कुर्सी, मेंटेनेंस, बिजली किराया, सिक्योरिटी स्टाफ, रिकरिंग खर्च पर पैसे लगे। विदेश की कॉन्फ्रेंस अटेंड करना चाहते हैं या बाहर से गेस्ट बुलाने के लिए  स्पेशल डेवलपमेंट फंड बना दिया गया।

प्रश्न- आईओई में 600 करोड़ दिए गए, लेकिन एक भी रिसर्च पेपर नेचर जैसी पत्रिका में नहीं छपी। पैसा हर किसी को चूरन की तरह से बांटा गया, जबकि किसी क्वालिटी रिसर्च में पैसा लगाते तो बेहतर रिजल्ट मिलता। 
उत्तर-  बीएचयू के रेपुटेशन की रैकिंग बढ़ी है। 2022 में 10 अंक और अब 14 अंक पर पहुंचे हैं। पब्लिकेशन 1600 से 2800 हुई है। अब पेटेंट कराना है तो वकील की फीस प्रोफेसर नहीं, बल्कि बीएचयू देता है। तील साल पहले 2-4 पेटेंट होते थे और 2022 के बाद 14 पेटेंट फाइल हो रहे हैं। 2020 में दो ही पेटेंट ग्रांट हुआ और अब छह हो रहे हैं। 

बीएचयू के एच इंडेक्स में चार गुना बढ़ोतरी
बीएचयू का एच इंडेक्स बढ़ा है। पहले 50 अंक था और 2024 में 205 अंक हो गया है। इसका अर्थ है कि पहले दुनिया भर के 50 ही वैज्ञानिक बीएचयू के किसी शोध को अपने पेपर में मेंशन करते थे, लेकिन अब 205 वैज्ञानिक कर रहे। इसी को साइटेशन भी कहते हैं। 

प्रश्न- शोध बढ़ाने के लिए क्या उपाय किये जा रहे हैं ?
उत्तर-  बीएचयू में 100 पीडीएफ यानी प्रोफेसर के साथ शोध सहायकों सैलरी दे रहे हैं। दो अलग फैकल्टी वाले वैज्ञानिकों ने शोध किया तो 25 लाख रुपये देंगे। पिछली ग्रांट खत्म हो गई है तो भी पैसे दे देंगे।

प्रश्न- पीएचडी में सिर्फ 8000 रुपये ही मिल रहें। इसको लेकर छात्रों ने शिक्षा मंत्री से भी शिकायत की। आप क्या कदम उठायेंगे ?
उत्तर-  पीएचडी में किसी ने अच्छा शोध पत्र छापा तो मैं 8 हजार से बढ़ाकर 15 हजार कर दूंगा। आईओई के 117 करोड़ फंड में से देंगे।

प्रश्न- बीएचयू में व्यक्तिगत शोध को मदद करने के लिए क्या कदम उठाया गया है ?
उत्तर-  वैज्ञानिकों को चिड़ियाघर का नहीं जंगल का जानवर बनाना है। उन्हें हाथ में पैसे नहीं देने। उनके हाथ को मजबूती देनी है। इसके लिये हमने एक ब्रिज ग्रांट शुरू कराया। यदि किसी वैज्ञानिक के रिसर्च का प्रपोजल भारत सरकार के बायो टेक्नोलाॅजी विभाग में प्रस्तुत होगा। उसके लिए मशीनों में 40 लाख चाहिए। यदि किसी एजेंसी ने उस वैज्ञानिक को 30 लाख दिए हैं तो बीएचयू भी उसे 10 लाख देगा। ये आईओई वाले  2.1 लाख से अलग है। इसकी जांच भी कराएंगे कि क्या इतने पैसों की जरूरत है या नही। 

प्रश्न- बीएचयू के सेंट्रल डिस्कवरी सेंटर सीडीसी और विभागों में कई लैब में मशीनों का इस्तेमाल ही नहीं हो रहा। यहां फॉरेसिंक, बीएसएल--3 और प्राचीन डीएनए लैब भी नहीं हैं। ऐसा कैसे बड़े स्तर पर रिसर्च होगा ?
उत्तर-  बिल्कुल ठीक कहा। मशीनें यूज नहीं हो रहीं थीं, जिनको अब चलाना ही है। मैं डंडा लेकर तो नहीं घूम सकता। हालांकि, इस साल लैब का परफॉमेंस रेवेन्यू बेस्ड कर दिया गया है। अब आपको धूल फांक रही मशीनें चलानी ही होंगी। नहीं तो स्कोर जीरो होगा। इसकी रिपोर्ट मेरे पास आती रहेगी

प्रश्न- छात्र या प्रोफेसर लैब की मशीनों का इस्तेमाल कैसे करेंगे, क्या उन्हें पैसे देने होंगे ?
उत्तर- नहीं। लैब के लिए हर पीएचडी छात्र को हर साल 40 हजार और प्रोफेसर को 50 हजार का रिसर्च फ्री कर दिया गया है। ये काम क्रेडिट रिसर्च स्कीम के तहत किया जा रहा है। लैब इस्तेमाल के लिये एक पासबुक दिया है। इससे 40 हजार तक फ्री लैब का इस्तेमाल होगा। पहले किसी दूसरे विभाग के लोगों को रुचि नहीं थी कि उनका लैब कोई और इस्तेमाल करे। लेकिन पैसा मिलने लगा तो उनका मेंटेनेंस का खर्च निकलने लगा। लैब के मशीनों से जो आय हो रही है, उसी से लैब की रिपेयरिंग हो रही है। 

प्रश्न- सीडीसी में धूल फांक रहीं करोड़ों की मशीनों का इस्तेमाल कैसे सुनिश्चित करेंगे ?
उत्तर-  सीडीसी की कुछ मशीनों का इस्तेमाल कम हुआ, लेकिन अब तेजी से हो रहीं हैं। सीडीसी के कोआर्डिनेटर को हर महीने रिपोर्ट देनी है कि कितनी कमाई हुई है। पहले ये था कि मशीन के इस्तेमाल के लिये सीडीसी के कोआर्डिनेटर का लोग खुशामत करते थे। अब सबको पासबुक दे दिया। इसी आधार पर आपकी परफॉर्मेंस चेक करने की व्यवस्था बना दी है।

प्रश्न- बीएचयू साइंस के साथ ही संस्कृत और धर्म की पढ़ाई का बड़ा केंद्र है। इन छात्रों की बेहतर शिक्षा के लिए क्या कोई कदम उठायेंगे ?
उत्तर-  विश्वनाथ मंदिर के पैसे से कई गरीब छात्रों के लिए काम किए जा रहे हैं। अब मंदिर की 5 प्रतिशत आय को संस्कृत और धर्म की पढ़ाई करने वाले गरीब बच्चों पर निवेश किया जाएगा। काशी विश्वनाथ मंदिर ट्रस्ट से कई बार कह चुका हूं कि मेरे यहां से संस्कृत पढ़ने वाले बच्चों को स्कॉलरशिप दिया जाए। गरीब बच्चाें को मदद दी जा सकती है।

प्रश्न- आप पर आरोप है कि नाॅन एकेडमिक लोगों को सलाहकार नियुक्त किया गया। ऐसा क्यों किया ?
उत्तर-
 डिपुटेशन पर बीएचयू के बाहर से लोगों को बुलाया है। ये तकनीकी ताैर पर स्मार्ट और अनुशासित कार्मिक हैं। वीसी ऑफिस में दो फाैजियों को फॉलोअप के लिये लगाया है। वो विभागों में जाते हैं और उनकी जरूरतों को परखते हैं। फैकल्टी की मांग ठीक है या नहीं, इसकी भी जमीनी हकीकत भांपते हैं। ये फाैजी कैंपस में चल रहे निर्माण कामों की भी जांच करते हैं। मकानों के हैंडओवर, चाबी, लैब के काम को देखते हैं।

प्रश्न- इन सलाहकारों की भर्ती का क्या आधार है ?
उत्तर- बीएचयू में उनकी परमानेंट नौकरी नहीं है। नाैकरी उनके परफाॅर्मेंस के ऊपर है। वे लोग अखबार में विज्ञापन देखकर बीएचयू में अप्लाई किये थे। इसी तरह से आईआईटी कानपुर के प्रोफेसर ने नमस्ते ऐप बनाया। मकान की टोटी खराब है तो उसकी जानकारी मोबाइल से दो। सूचना कंप्यूटर सेंटर तक पहुंचेगी। फौजी ये काम बेहतर कर रहे हैं। इन्हीं लोगों को इस्टीमेट चेक की जिम्मेदारियां दी गईं हैं।

प्रश्न- ईसी वर्सेज वीसी की लड़ाई चल रही है। सारे फैसले खुद से क्यों लिए जा रहे हैं ?
उत्तर-  ये कहना ठीक नहीं है। कहीं को वर्सेज़ नहीं है। विश्वविद्यालय स्थापित नियमों व प्रावधानों के हिसाब से संचालित होता है और इसमें न कोई ढील बरती जा रही है और न ही किसी तरह के समझौते की कोई गुंजाइश है। विश्वविद्यालय को सशक्त करने में हम संस्थागत व्यवस्थाओं के दायरे में रहकर आगे बढ़ रहे हैं।

प्रश्न- अस्पताल में मरीजों का लोड बहुत है। मरीजों को एक ही काम के लिए 5 जगह चक्कर लगाने पड़ते हैं। सिंगल विंडो सिस्टम कब लागू होगा ? 
उत्तर-  हमारे पास कोई जादूई छड़ी नहीं है। लेकिन, ये हमारी जिम्मेदारी है कि अस्पताल की व्यवस्था बेहतर हो। कैसे होगा, उसका मैकेनिज्म नहीं बता सकता। दोषारोपण करने से कोई फायदा नहीं होगा। मैं मान रहा हूं और संज्ञान भी ले रहा हूं। चिंतिंत हूं। लेकिन काम करने की शक्ति है। सहयोग जितना मिलेगा उतनी ही स्पीड से काम करूंगा। 

प्रश्न- आखिर क्यों,  मरीजों का लोड संभालने में बीएचयू को कई साल से मशक्कत ही करनी पड़ रही है ?
उत्तर- इस पूरे पूर्वांचल में एक ही बड़ा अस्पताल है। वो भी रिसर्च इंस्टीट्यूट है। हमारा बेसिक फ्रेमवर्क टीचिंग हॉस्पिटल है। हमारे छात्रों को इलाज करना सीखना है। डाॅक्टरों का प्राइमरी काम पढ़ाना है। लेकिन वे समाज से अलग नहीं हो सकते। इतने छात्रों को पढ़ाने के लिए इतने ही मरीज की जरूरत है। यहां पर हर 20 किमी दूर तक अस्पताल बनाना चाहिए। टाटा का अस्पताल बना तो बीएचयू से कैंसर मरीजों का लोड कम हुआ ना। 

प्रश्न- अस्पताल में आईसीयू बेड कम हैं। हर दिन मरीज मरते हैं। कार्डियो में बेड की लड़ाई 4 साल से चल रही है, उसको कैसे सुलझाएंगे ? 
उत्तर-  आईसीयू बेड लगाने से जरूरत कभी भी पूरी नहीं होगी। पहले तो सिर्फ 16 बेड थे। अब 50 हैं। 30 नई बिल्डिंग में और 20 पुरानी में। मौका मिलेगा तो बढ़ा देंगे, लेकिन दिक्कत फिर भी बरकरार रहेगी। कार्डियोलाॅजी विभाग के विवाद को सुलझाने के प्रयास किये गये हैं। हमने संवाद और चर्चा की संस्कृति को प्रोत्साहित करने की भरपूर कोशिश की, ताकि विवादों और मतभेदों का समाधान आपसी बातचीत से निकाला जा सके।

प्रश्न- आये दिन अस्पताल में धरना, हड़ताल और मरीजों के साथ दुर्व्यव्यहार या मारपीट होते रहता है, इससे  कैसे निपटेंगे ?
उत्तर- पूरे अस्पताल के माहौल को दबंगई खराब करती है। बांबे के अस्पतालों में तो झगड़ा नहीं होता। सिफारिश तक तो ठीक है, लेकिन गुंडागर्दी नहीं चलेगी। अब दबंगई को कम करना है। हमारी कोशिश जारी है।

प्रश्न-  डॉक्टर प्राइवेट प्रैक्टिस करते हैं। चिन्हित मेडिकल स्टोर पर दवाएं मिलती हैं, उससे मरीजों पर अत्यधिक बोझ पड़ता है।
उत्तर- ऐसे कई मामले संज्ञान में आये हैं। इन पर रोकथाम के लिये पूरी सख्ती बरती जा रही है। अनएथिकल प्रैक्टिस करना किसी भी तरह से क्षम्य नहीं है। कैसे जांच करा रहा ये मैकेनिज्म गुप्त है। हां, लेकिन बहुत जल्द इससे निपटेंगे। 
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प्रश्न- आंदोलन करने वाले छात्रों को सस्पेंड किया जा रहा। छात्रों पर अंकुश रखने की ऐसी व्यवस्था कब तक चलेगी ? 
उत्तर-  हमारा प्रयास है कि विश्वविद्यालय में पठन-पाठन का वातावरण किसी भी तरह से बाधित न हो। अनुशासन से जुड़े मामलों को देखने के लिए विश्वविद्यालय में एक स्थापित व्यवस्था है, जो प्रभावी रूप से अपना काम कर रही है।

प्रश्न-  क्या अपने काम से संतुष्ट हैं ?
उत्तर- आप एकेडमिक इंस्टीट्यूशन में कभी संतुष्ट नहीं हो सकते। अभी मैं भी नहीं हूं। जिस दिन कहेंगे कि मैं अच्छा काम कर रहा हूं और तो वहां से आपकी उल्टी गिनती शुरू हो जाएगी।
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