किंतु परिषद ने तो मंदिर से गंगा जी तक ऐसी योजना तैयार की है, जिसमें निर्माण ही निर्माण है। उसमें न तो गंगा जी से मंदिर का दर्शन होगा और न ही मंदिर से शिव गंगा पथ सुगम, आध्यात्मिकता से पूर्ण होगा। मंदिर के न्यास बोर्ड में कोई भी गैर सरकारी निष्णात हिंदू नहीं है जिसको मंदिर की परंपरागत पूजा पद्धति का ज्ञान हो।
यह है मंदिर अधिनियम :
श्री काशी विश्वनाथ मंदिर अधिनियम 1983 के मुताबिम मंदिर में पूजा पद्धति के प्राधिकारी मंदिर के अर्चक हैं। अधिनियम की धारा 17(1) में लिखा है कि मंदिर के न्यास बोर्ड से नियंत्रण रहते हुए मंदिर के प्रबंध और नियंत्रण की बाबत मुख्य कार्यपालक अधिकारी मंदिर के सेक्युलर कार्यों के लिए जिम्मेदार होगा।
अधिनियिम की धारा 22(1) के अनुसार मंदिर के अर्चक मंदिर की धार्मिक पूजा पद्धति, परंपरागत धार्मिक विधि विधान को कार्यान्वित करने तथा संरक्षित रखने के लिए जिम्मेदार होंगे। न्यास परिषद, मुख्य कार्य पालक अधिकारी या अन्य कोई भी अधिकारी अर्चकों के धार्मिक कार्यक्षेत्र में किसी भी प्रकार हस्तक्षेप नहीं करेंगे। सर्वोच्च न्यायालय ने भी 14 मार्च 1997 को यही आदेश निर्गत किया है जिसका पालन बाध्यकारी रूप से अनिवार्य है।