तलाक से होने वाली तकलीफों को कहानियां जब-तब सुनने को मिलती हैं। इनमें परिवार टूटने से लेकर परवरिश में आने वाली दिक्कतों के कई मामले होते हैं। ताजा मामले में जो सामने आया है, वह इस व्यवस्था के बारे में सोचने को मजबूर करता है।
बैंक मैनेजर के तौर पर कार्यरत बेटे ने पिता की आकस्मिक मौत के बाद न केवल शव लेेने से इन्कार कर दिया, बल्कि मरहूम पिता को दफनाने के लिए मिट्टी भी नहीं दी। पिता का कसूर यह था कि उसने उसकी मां को तब तलाक दिया था, जब वह गर्भ में था।
शनिवार देर रात बस स्टैंड तिराहे के पास सिलाई का काम करने वाले फरियाद अली (50) की सड़क दुर्घटना में मौत हो गई। ओबरा क्षेत्र के बिल्ली गांव के निवासी फरियाद करीब तीस साल से शक्तिनगर में सिलाई कर रहे थे।
दुर्घटना के बाद मौके पर पहुंची पुलिस ने फरियाद अली की शिनाख्त कराने के बाद परिवार केेे लोगों की तलाश की। पता चला कि फरियाद का बेटा फैजान एक बैंक में प्रबंधक पद पर तैनात है। फरियाद के चार भाई भी हैं। पुलिस ने इनसे संपर्क किया लेकिन कोई भी फरियाद का शव लेने और उसे दफनाने की रस्म निभाने के लिए तैयार नहीं हुआ।
पुलिस ने शव न लेने के बाद शव न लेने के कारणों की पड़ताल की। इसमें जानकारी हुई कि फरियाद अली ने अपनी पत्नी को गर्भावस्था के दौरान तलाक दे दिया था। पुत्र को जन्म देने के बाद फरियाद की पत्नी दुनिया से चल बसी।
बाद में बेटे के नाम फैजान रखा गया और उसका लालन-पालन नाना और खाला के घर हुआ। तलाक देने से नाराज फैजान के चारों चाचा-चाची ने भी फरियाद से रिश्ता तोड़ लिया। मौजूदा समय बैंक प्रबंधक के पद पर तैनात फैजान ने पिता के शव को लेने की पुलिस की गुजारिश को आपबीती सुनाकर मना कर दिया।
इसके बाद थानाध्यक्ष भारत भूषण तिवारी ने मुस्लिम कमेटियों से संपर्क साधा। वाकया बताते हुए शव को धार्मिक रस्म-रिवाज के मुताबिक दफनाने की अपील की। इसके बाद खड़िया के कारोबारी व समाजसेवी मैनुद्दीन अंसारी (दमड़ी) सहित कई लोग आगे आए।
अंतत: 40 से भी ज्यादा घंटे बाद सोमवार देर शाम फरियाद के शव को खड़िया बाजार स्थित कब्रिस्तान में दफनाया गया।