साहित्य में सांस्कृतिक संवेदना और मूल्यबोध दोनों समाहित हैं। इससे साहित्य व संस्कृति दोनों ही ऊर्जावान होते हैं। दोनों ही समाज की उपज हैं। ये जीवन के संस्कारों व सरोकारों, दोनों से जुड़े हैं।
साहित्य के संस्कार पैदा करने होते हैं, जबकि संस्कार संस्कृति से जन्म लेते हैं। जब कोई समाज अपने इतिहास, अतीत और परंपरा से कटने लगता है तब समय अपने साहित्य और संस्कृति की तरफ देखता है।
इस तरह समय, समाज, साहित्य और संस्कृति एक-दूसरे से जुड़े हैं। इनका रसायन एक ही हैं। ये बातें प. बंगाल के राज्यपाल केशरीनाथ त्रिपाठी ने कहीं।
वे दुर्गाकुंड स्थित धर्मसंघ शिक्षा मंडल में ‘हिंदी साहित्य में सांस्कृतिक संवेदना और मूल्यबोध’ विषयक अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी एवं भारतीय लेखक शिविर के उद्घाटन सत्र को बतौर मुख्य अतिथि संबोधित कर रहे थे।
साहित्य अकादमी और केंद्रीय हिंदी संस्थान आगरा के सहयोग से विद्याश्री न्यास व श्री बलदेव पीजी कॉलेज बड़ागांव के हिंदी विभाग के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित तीन दिवसीय शिविर के पहले दिन केशरीनाथ त्रिपाठी ने कहा कि
साहित्य में मूल्य बोध कायम है और यही इसकी मजबूती है। विशिष्ट अतिथि के तौर पर प्रो. नंद किशोर पांडेय ने कहा कि समस्त सृष्टि के साथ जुड़ने का उपक्रम भारतीय धर्म, दर्शन और संस्कृति है।
कहा कि वेद की महिमा लोक के साथ सम्मिलित होकर और मुखर होती है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता बीएचयू के कुलपति प्रो. जीसी त्रिपाठी ने की। इस अवसर पर पं. विद्यानिवास मिश्र की पुस्तक ‘पंडित विद्यानिवास मिश्र संचयन’ और ‘पंडित विद्यानिवास मिश्र संचयिता’ (कालजयी निबंधों का संकलन) का लोकार्पण किया गया।
वहीं प्रवासी साहित्यकार डॉ. तेजेंद्र शर्मा, जय वर्मा, शैल अग्रवाल, सुषम बेदी और स्नेह ठाकुर को सम्मानित किया गया। स्वागत डॉ. अरुणेश नीरन ने किया।
संचालन नीरजा माधव और धन्यवाद ज्ञापन डॉ. दयानिधि मिश्र ने किया। इस अवसर पर बलदेव पीजी कॉलेज के प्राचार्य डॉ. उदयन मिश्र व हिंदी विभागाध्यक्ष प्रकाश उदय मौजूद रहे।