सोशल मीडिया ने साहित्य के पाठक छीन लिये। लोगों का झुकाव सोशल मीडिया की ओर है। अब साहित्य के पाठक कम हो रहे हैं। यह कहना है साहित्यकार डॉ.रामसुधार सिंह का। अमर उजाला से विशेष बातचीत में डॉ. रामसुधार ने कहा कि आधुनिक हिंदी साहित्य की स्थापना से लेकर विकास तक बनारस की भूमिका रही है। बनारस के पास साहित्य की एक बड़ी थाती है। आधुनिक हिंदी कविता जहां से शुरू होती है, उसकी नींव भी इसी काशी में रखी गई।
भारतेंदु हरिश्चंद्र, श्याम सुंदर दास, नागरी प्रचारिणी सभा, आचार्य रामचंद्र शुक्ल। यह वह समय था जब आधुनिक हिंदी साहित्य आकार ले रहा था। इसके बाद एक लंबे समय तक काशी साहित्यिक गतिविधियों का गढ़ रहा।
एक सुदृढ़ परंपरा का अब जो हश्र हो रहा है, उसे देखकर बड़ी निराशा होती है। आज भी हिंदी की दर्जनों पत्रिकाएं प्रकाशित हो रही हैं, मगर इनके पाठ कम हो रहे हैं। फेसबुक और व्हाट्सएप पर जो आ रहा है, लोग उसी को पढ़ रहे हैं। संत कबीर से लेकर भारतेंदु तक सभी ने अपने समय की विसंगतियों पर बड़ी बेबाकी से चोट की। यहां कोई भी एक विचारधारा से बंधकर कभी नहीं रहा।
सभी के लिए साहित्य प्रमुख था। साहित्य बनारस के केंद्र में है। एक समय हास्य व्यंग्य की परंपरा भी बनारस से चली। बेढब बनारसी, भैया जी बनारसी, कामता नाथ चोंच जैसे लोगों ने व्यवस्था पर सटीक व्यंग्य किए, हालांकि साहित्य में उसे स्थान नहीं मिला।
नहीं मिल पा रहा साहित्यकार को महत्व
रामसुधार सिंह
- फोटो : अमर उजाला
डॉ. रामसुधार सिंह यह मानते हैं कि वर्तमान में साहित्यकारों को महत्व नहीं मिल पा रहा। यही वजह है कि साहित्यकारों की कोई मजबूत नई पीढ़ी नहीं दिख रही। अब हिंदी साहित्य से जुड़े होने का मतलब है कि वह किसी विश्वविद्यालय में नौकरी कर रहा है।
प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद तो किसी विश्वविद्यालय में नहीं थे, लेकिन जो साहित्य उन्होंने रचा, वह बेजोड़ है। पहले गुरु भी साहित्य के प्रति युवाओं में रुझान पैदा करते थे, अब ऐसे शिक्षकों की कमी है। अब भी कई युवा हैं जो गीत, गजल, साहित्य बढि़या लिख रहे हैं।
डॉ. राम सुधार सिंह ने बताया कि बनारस से जुड़े चंद्रबली सिंह, डॉ. शिवप्रसाद सिंह, डॉ. बच्चन सिंह, विद्यानिवास मिश्र, काशी नाथ सिंह सहित कई ऐसे नाम हैं, जिनकी वजह से हिंदी साहित्य को राष्ट्रीय स्तर पर एक नई पहचान मिली। उनके लिखे को लोग आज भी याद करते हैं।