पॉलिथीन पर प्रतिबंध से एक बार फिर कुटीर उद्योग की बेहतरी की उम्मीद जग गई है। अब ठोंगे, कपड़े के बैग सरीखे कुटीर उद्योग चमकेगे। अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे ऐसे उद्योग से जुड़े कारोबारियों में नई उम्मीद जग गई है। यह रोजगार देने के साथ-साथ प्रदूषण नियंत्रण में भी सहायक होगा।
दो दशक पहले दुकानों व प्रतिष्ठानों पर सामान कागज के ठोंगा व दोना में दिया जाता रहा है। पॉलिथीन के चलन ने इस इस कुटीर उद्योग को लगभग खत्म कर दिया। धीरे-धीरे कागज के लिफाफों की जगह पॉलिथीन ने ले लिया।
कपड़े और जूट के थैले व लकड़ी की डलिया का इस्तेमाल सामान लाने के लिए किया जाता था। इस पर भी पॉलिथीन बाजार ने दखल दे दिया और यह चलन से बाहर हो गया। दोना, जूट के थैले के उद्योग से काफी लोगों को रोजगार मिलता था। इससे अच्छी-खासी आमदनी भी होती थी।
पॉलिथीन के चलन ने कई परिवारों की रोजी-रोटी छीन ली। शहर में प्रदूषण बढ़ा सो अलग से। छोटे दुकानदारों का कहना है कि सरकार की सख्ती और जागरूकता अभियान से पॉलिथीन की बिक्री में कमी आई है। लेकिन चाइना की पॉलिथीन अब भी बिक रही है।
बाजार में 70 फीसदी से अधिक चाइना पॉलिथीन का कारोबार हो रहा है। सस्ता होने के साथ मजबूती के चलते इसकी डिमांड है। कुटीर उद्योग से जुड़े रोहित राज, श्याम नारायण केसरवानी व मोहित ने शासन-प्रशासन के प्रयास की सराहना करते हुए कहा कि इसे सख्ती से लागू किया जाना चाहिए। इससे काफी हद तक बेरोजगारी दूर होगी।
आयोजनों में दिखने लगे दोना-पत्तल
पॉलिथीन पर रोक का असर दिखने लगा है। जागरूकता का असर है कि कुछ आयोजनों में लकड़ी के चम्मच, दोना, पत्तल नजर आने लगे हैं। कागज के लिफाफे, कुल्हड़, दोना-पत्तल, कागज के कप व ग्लास के उत्पादन में वृद्धि होने की उम्मीद है।