अकबर के दरबार में मियां तानसेन ने जो स्वरचित राग गाकर दहकते मौसम को शीतलता प्रदान की थी, उसे ही मिया की मल्हार कहा जाता है। इस राग को गाने से लगता है जैसे उन्होंने इबादत करके इसे रचा होगा। सुर ऐसे लगते हैं जैसे प्रकृति पूजा कर रहे हों। गौड़ मल्हार, सूरदासी मल्हार, रामदासी मल्हार में वर्षा ऋतु के अलग-अलग प्रकारों बहुत संजीदगी से प्रयोग मिलता है।
मन की मलीनता को हरने वाला महीना है सावन। इसीलिए सावन में मल्हार तैयार हुआ है जिसके सुरों की बारिश से प्रकृति से लेकर मन तक की मलीनता झर जाती है। लेकिन जिनके पति नौकरी करने के लिए दूर गए होते हैं उनका जिया जलने लगता है। बनारस घराने की ठुमरी गायिका शुभ्रा गुहा बताती हैं कि सावन एक लहर है जो महिलाओं के दिलों में प्रेम की पींगे लेकर आती है।
गरज गरज चहुंओर मोहें डरपावे बिजुरिया
पिया बिनु सावन की अंधियारी कारी भारी लागे रैन.../झुकि झुकि गोरी झरोखन में झांके परत न पल छिन चैन.../ तापर बोले पपीहा पापी निशिदिन पीउ पीउ बैन...। सावनी की इस बंदिश के जरिए शुभ्रा गुहा बरखा ऋतु का वर्णन करती हैं।
वह पूरब अंग की ठुमरी में कजरी से विरह का आलाप इस कदर लेती हैं-घिर घिर आई कारी बदरिया/ पिया नहिं आए मैं का करूं गुइयां.../ दादुर मोर पपीहा बोले/ मुझ बिरहन का मनवा डोले... निशिदिन उनकी याद सताए...।
शुभ्रा दस साल पुराना वाकया याद करती हैं जब वह एक संगीतोत्सव में प्रस्तुति देने कनाडा गई थीं। जुलाई का आखिरी हफ्ता था। उस दिन बहुत ज्यादा गरमी थी। हाल में गौड़ मल्हार का तान छेड़ने पर पवन का झोंका सा चलने लगा। जब बंदिश गाकर बाहर आईं तो पता चला इतनी बारिश हुई कि लोग तर-ब-तर हो गए।
शुभ्रा आचार्य श्रीकृष्ण रतनजनकर की बंदिश सुनाती हैं- बरखा रितु बैरी हमारे...मास आषाढ़ घटा घन गरजत पिउ परदेस हमारे...। बरखा ऋतु अकेली विरहन के लिए बैरन हो जाती है।
आगरा घराने के आफताबे मौसिकी उस्ताद फैयाज खान की सूरदासी मल्हार की बंदिश के जरिए सावन के बिरह पर रोशनी डालती हैं- गरज गरज चहुंओर डरपावे बिजुरिया मैं का/निशिदिन पिया बिनु कछु ना सुहाए... झिंगुरवा बोले झूम झनन झनन/ पवन चले सन सनन सनन/ ऐसी बरखा रितु में मोरी आली/ प्रेम पिया को जाए कोऊ लाए...।
इसके बाद खमाज अंग में गौड़ मल्हार की बंदिश से नायिका की पुकार का चित्रण वह इस कदर करती हैं- दादुरवा बुलाए बदरिया घिर जाय रे/ पिया बिनु मोरा जिया लरजाय रे.../ सुखरंग से कोऊ जाए संदेश पिया बिना ऐ रितु मोहे नहिं भावे...अजहूं न लीन्हीं मोरी खबरिया....।
वह बनारस घराने की राग पीलू और तिलक कामोद मिश्रित बंदिश से सावनी बहार के सौंदर्य का बखान करती हैं-निंबुआ तले डोला रख दे मुसाफिर/ आई सावन की बहार रे....
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शुभ्रा गुहा
बनारस घराना
गुरु: ध्रुवतारा जोशी,
आईटीसी संगीत रिसर्च एकेडमी- संगीत गुरु
गायन: ख्याल, ठुमरी, चैती, कजरी , होरी, सावन, दादरा, भजन।