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आषाढ़ के बादलों का शोर जीवन में बुनता है आनंद का संगीत

Thu, 06 Jul 2017 04:30 PM IST
amarujala.com, written by अनूप ओझा
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ठुमरी गायिका पदमश्री सोमा घोष - फोटो : अमर उजाला
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जेठ में जब धरती तपने लगे और प्रियतम भी परदेस कमाने गए हों। पुरवाई बहने लगे। आषाढ़ के मेघों की उमड़-घुमड़ शुरू हो जाए। पहली बारिश की फुहारें पड़ने लगें तो विरहिनी की वह रात काटे नहीं कटतीं। दिल धड़कने लगता है। रात काजल की तरह काली हो जाती है।
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कजरारे मेघों की मानिंद दिलों पर घिर आने वाली घटाओं की गरज-तरज से सुर, लय, ताल की लहरें भी मचलने लगती हैं। वैसे ही, जैसे कल-कल करती नदियां, झर-झर बहते झरनों से मन के सागर में उठने वाली लहरें हिलोरें मारने लगती हैं। तो ऐसे में भला किसका मन मयूर न होगा। बादलों के पंख तो दिलों पर उग आएंगे ही। फिर वो वहां ले जाएंगे , जहां जहां हरीतिमा की चादर ओढ़े इंद्रधनुषी आभा को सिर का ताज बनाए प्रकृति साज-शृंगार कर रही होगी।
यह कहना है ठुमरी गायिका पदमश्री सोमा घोष का...। 

दिलों पर घिरने वाली आषाढ़ की घटाएं किसी को भी जवान बना देती हैं। बादलों का शोर सुनकर एक अलग जोश भर जाता है। कमजोर आंखों में भी चमक आ जाती है। हर कोई मन से पूरे जोश के साथ वह वर्षा के स्वागत के लिए तैयार हो जाता है।
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किसान अपने हल, बैल को लेकर निकल जाते हैं। अंधेरे में ही, धरती की कोख से नए बीजों के अंकुरण से लहलहाती फसल लेने का संकल्प लेकर। ठीक उसी तरह विरहिनी के भी होठ थरथराने लगते हैं। कंठ गुनगुनाते लगते हैं। झूलों पर सहेलियों की बीच भीगती हुई विरहिनी प्रियतम के बिछोह में होती है, तब कंठ से कजरी निकलती है। विरह के राग गूंजने लगते हैं।  

ठुमरी गायिकी सोमा घोष आषाढ़ के मेघों, बारिश की फुहारों को लेकर अपने अनुभवों को साझा करते हुए कजरी पर सुर लगाती हैं-पिया गए परदेस भेजे एको ना संदेश/मोहे विरहा सताए आधी रतिया ना...। एक तो रात की अंधेरी/बदरा घेरे बेरी-बेरी/जियरा कांपे मोरा चमकेले बिजुरिया ना...।

वह विरह के इस सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए गाती हैं- करूं कवन उपाय/ बदरा घेरि घेरि आए/ मोरे सैंया नाहिं आए/नन्हीं नन्हीं बुंदिया बरस गए/कारी अंधियारी रैना मोहें सतावे...।  कमाई के लिए पिया का लंबे समय तक परदेस में रहना, किसी स्त्री को मंजूर नहीं होता।

वह मिर्जापुरी कजरी गाती हैं-  हरे रामा रिमझिम  से बरसे ला पनिया/चली तो आओ जनियां रे हरी...। सोमा कहती हैं कि प्रियतम जब परदेस से घर आ जाते हैं तब होने वाली बारिश में वह सखियों के साथ भीगते हुए कजरी इस तरह गाती है- रिमझिम बरसे ले बदरिया सखिया गावेलीं कजरिया/ मोरी भींजेले चुनरिया बचाइला बलमू...।

जब बहुत बारिश होने लगती है तब वह पति से मेहंदी ले आने और पिसवा-रचवाने की मनुहार करती है। आषाढ़, सावन के साथ स्वरों, रागों का यह आनंद भारतीय संस्कृति के अलावा कहीं नहीं मिलता। 
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