Shri Vallabhacharya Prakatyotsav: बाबा विश्वनाथ को भगवान कृष्ण का भोग चढ़ाने की परंपरा 500 साल से चली आ रही है। महाप्रभु श्रीवल्लभाचार्य के नंदोत्सव पर यह परंपरा निभाई जाती है।
बाबा विश्वनाथ 500 साल पहले से भी भगवान श्रीकृष्ण (ठाकुर जी) का भोग ग्रहण करते हैं। यह परंपरा महाप्रभु श्रीवल्लभाचार्य के नंदोत्सव पर निभाई जाती है। चौखंभा स्थित षष्ठपीठ श्रीगोपाल मंदिर में ठाकुर जी को भोग लगने के बाद रोज बाबा विश्वनाथ को भेजा जाता है।
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ये कहना है भारत भारती परिषद के अध्यक्ष अशोक वल्लभदास का। उन्होंने बताया कि महाप्रभु श्रीवल्लभाचार्य ने काशी को कर्मस्थली बनाकर शुद्धाद्वैत सिद्धांत और पुष्टिमार्ग का विस्तार किया। काशी में जतनबर, हनुमानघाट, पंचगंगा और मणिकर्णिका घाट पर महाप्रभु के स्मरण स्थल हैं। घरुवार्ता साहित्य में उल्लेख है कि जतनबर में महाप्रभु श्रीवल्लभाचार्य ने नंदोत्सव का पहली बार आयोजन किया।
ये है मान्यता
मान्यता है कि इसमें भगवान शिव बाबा कालभैरव के साथ शामिल हुए और ठाकुर जी का भोग ग्रहण किया। तब से यह परंपरा निभाई जा रही है। उन्होंने बताया कि किसी जमाने में जतनबर और विश्वनाथ मंदिर के बीच इमली का पेड़ था। माना जाता था कि इस पर भूतों का डेरा है। इसलिए ठाकुर जी का राजभोग अशुद्ध न हो जाए, इसलिए भोग लेकर जाते समय आगे बाबा कालभैरव जाते हैं।
जतनबर में ही महाप्रभु ने शुद्धाद्वैत दर्शन और पुष्टिमार्ग की स्थापना की। यहीं पर चैतन्य महाप्रभु उनसे मिलने आए थे। गोपाल मंदिर के गोस्वामी श्याम मनोहर महाराज ने बताया कि उन्होंने काशी में ही वेद, उपनिषद आदि का अध्ययन किया।
आज भी जन्माष्टमी और होली का भोग चढ़ता है
अशोक वल्लभदास ने बताया कि अभी बाबा को माला व पान भोग में जाता है। दोपहर में राजभोग लगने के बाद मंदिर के समाधानी भोग बाबा दरबार में पुजारी को देते है। जन्माष्टमी, होली आदि त्योहारों पर ठाकुर जी को लगा विशेष भोग बाबा को पहुंचाया जाता है।