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श्रीशीतला अष्टमी: मां शीतला का होगा बसिऔरा पूजन, लगेगा गुलगुला; आम व ककड़ी का भोग

Fri, 08 May 2026 11:19 PM IST
Aman Vishwakarma अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।

सार

Sheetala Ashtami 2026: इस दिन माता का विधिवत शृंगार होगा और मौसमी फलों आदि का भोग लगाया जाएगा। उन्होंने बताया कि इसके बाद आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को माता शीतला की बसिऔरा पूजा होगी। इन चारों मास में माता शीतला की विशेष पूजा से भक्तों और उनके बच्चों के बेहतर स्वास्थ्य और दीर्घायु की प्राप्ति होती है।
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शीतला माता मंदिर। - फोटो : संवाद
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विस्तार
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Varanasi News: शीतला माता का चैत, वैशाख, ज्येष्ठ और आषाढ़ मास की शीतलाष्टमी पर बसिऔरा पूजन का विधान है। भक्त चैत और वैशाख मास की अष्टमी पर यह पूजा कर चुके हैं। अब इस बार शुद्ध ज्येष्ठ माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को श्रीशीतला अष्टमी की पूजा होगी। 

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ज्योतिषाचार्यों के अनुसार, ज्येष्ठ माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि 9 मई को दोपहर 2:04 बजे शुरू होकर 10 मई को दोपहर 3:07 बजे तक रहेगी। जबकि धनिष्ठा नक्षत्र 9 मई को रात 11:25 बजे से 10 मई की रात 12:50 बजे तक रहेगा। उदया तिथि के अनुसार अष्टमी तिथि 10 मई को रहेगी। अष्टमी व्रत इसी दिन रखा जाएगा।

बड़ी शीतला माता मंदिर के महंत पं. शिव प्रसाद पांडेय लिंगिया ने बताया कि चैत व वैशाख मास की शीतलाष्टमी के बाद अब ज्येष्ठ की अष्टमी पर बसिऔरा पूजा होगी। भक्त 9 मई की रात में ही साफ-सफाई कर विविध पकवान बनाकर भोर से सुबह 9 बजे तक मंदिर में माता का बसिऔरा पूजन करेंगे। 
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स्कंद पुराण के अनुसार, शीतला माता का वाहन गर्दभ (गधा) है। माता अपने हाथों में कलश, झाड़ू, सूप तथा नीम की पत्तियों से सुशोभित रहती हैं। मान्यता है कि माता के विधिवत पूजन से त्वचा संबंधी रोग, बुखार, खसरा, चेचक, आंखों के रोग तथा अन्य व्याधियों से रक्षा होती है और सुख-समृद्धि प्राप्त होती है।

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भैरव मंदिरों में होगी पूजा,कटेंगे संकट
ज्येष्ठ मास कृष्ण पक्ष की अष्टमी को कालाष्टमी भी कहा जाता है। इस अवसर पर भैरव मंदिरों में भी दर्शन-पूजन के लिए भीड़ उमड़ेगी। काशी में स्थित अष्ट भैरव और अष्टदश भैरव मंदिरों में विशेष पूजन होगा। बाबा कालभैरव, बटुक भैरव, आस भैरव, कपाल भैरव आदि मंदिरों में शृंगार और पूजन-अर्चन किया जाएगा। मान्यता है कि भैरव बाबा के दर्शन-पूजन एवं व्रत करने से आरोग्य सुख की प्राप्ति होती है। साथ ही अकाल मृत्यु के भय एवं अन्य कठिनाइयों का निवारण होता है।
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