लगन के सीजन में थोक और फुटकर बाजारों में जहां जबरदस्त खरीदारी की रौनक होनी चाहिए थी वहां नोटबंदी के चलते मंदी जैसे हालात हैं। कारोबारियों की मानें तो पिछले कुछ वर्षों में कारोबार में इतनी गिरावट देखने को नहीं मिली। नगदी संकट के चलते स्थानीय ही नहीं, बाहरी ग्राहक भी बाजार का रुख नहीं कर रहे हैं। पर्यटन कारोबार प्रभावित होने से बाजार पर दोहरी मार पड़ी है। नोटबंदी के बाद से अब तक डेढ़ हजार करोड़ रुपये से अधिक का कारोबार प्रभावित हुआ है। दूकानदार हाथ पर हाथ धरकर बैठे हैं। रोजाना की खरीद-बिक्री में दो-तिहाई से अधिक गिरावट बताई जा रही है।
सराफा मंडी हो या विश्वेश्वरगंज की अनाज मंडी। पहड़िया फल मंडी हो या राजातालाब सब्जी मंडी। ये वो प्रमुख मंडियां हैं, जो वाराणसी सहित पूरे पूर्वांचल के व्यापार का केंद्र हैं। सराफा मंडी में सन्नाटा पसरा है। विश्वेश्वरगंज मंडी और गोला दीनानाथ में पहले की तुलना में चौथाई कारोबार भी न होने से व्यापारी चिंता में हैं। पहड़िया फल मंडी और राजातालाब सब्जी मंडी में नाममात्र कारोबार हो रहा है।
दूसरे बाजारों के भी हालात ऐसे ही हैं। इलेक्ट्रानिक मार्केट में सन्नाटे की स्थिति है तो आटोमोबाइल्स सेक्टर में भी 80 प्रतिशत तक कारोबार प्रभावित है। बर्तन मार्केट की भी चहल-पहल गायब है। बनारसी साड़ी कारोबार भी अघोषित मंदी की मार से कराह रहा है। आम तौर पर पूर्वांचल के अलावा बिहार तथा मध्य प्रदेश के समीपवर्ती जिलों के कारोबारी और आम लोग खरीदारी के लिए यहां आते हैं लेकिन नोटबंदी के बाद से इक्का-दुक्का खरीदार ही आ रहे हैं। बराबर भीड़ से भरे रहने वाले गोदौलिया-दशाश्वमेध मार्ग के बाजार में दूकानदारों की बोहनी तक नहीं हो पा रही है। थोक बाजार में फिलहाल आर्डर नहीं मिल रहे हैं तो वहीं पहले की बिक्री का पैसा भी फंसा है। मच्छोदरी, मैदागिन, मालवीय मार्केट, नेहरू मार्केट, काशीपुरा, सप्तसागर, सुड़िया, ठठेरी बाजार, गोविंदपुरा, रेशमकटरा, हड़हासराय, दालमंडी, नई सड़क, कोदई चौकी, जंगमबाड़ी, मलदहिया, नदेसर, औरंगाबाद, सिगरा, चांदपुर औद्योगिक क्षेत्र में भी मंदी का आलम है।
गल्ला और किराना का थोक कारोबार भी खासा प्रभावित हुआ है। बिक्री 60 से 70 फीसदी तक कम हो गई है। शहर और देहात के फुटकर कारोबारी कैश की किल्लत के चलते कंज्यूमर गुड्स डिस्ट्रीब्यूटर्स से सामान नहीं खरीद पा रहे हैं। भगवान दास जायसवाल, बसंत गुप्ता, काशीनाथ गुप्ता, बबलू, गोपालू, मुरलीधर जायसवाल आदि कारोबारियों ने बताया कि फास्ट मूविंग कंज्यूमर गुड्स (एफएमसीजी) सेल्स में लोकल किराना दूकानों का योगदान 70 फीसदी है। इनमें से सिर्फ एक फीसदी के पास ही क्रेडिट और डेबिट कार्ड्स, ई-वॉलेट या मील कूपन जैसे पेमेंट के दूसरे जरिए हैं। ऐसे में नगदी संकट के चलते बिक्री में दो-तिहाई से अधिक गिरावट आई है। बाजार में पर्याप्त नकद प्रवाह जल्द सुनिश्चित न कराया गया तो कारोबार और प्रभावित हो जाएगा।
वाराणसी वस्त्र उद्योग संघ के महामंत्री राजन बहल ने बताया कि नोटबंदी के बाद से अब तक बनारसी और डिजाइनर साड़ी की बिक्री 80.85 फीसदी घट चुकी है। बाहर के व्यापारियों के न आने से 500-600 करोड़ रुपये का माल डंप है। साड़ी कारोबार में ज्यादातर बेयरर चेक काटने की परंपरा है लेकिन बैंकों के ऐसे चेक न लेने से कारोबारियों के लिए समस्या खड़ी हो गई है। बुनकरों के सामने दो जून की रोटी का संकट खड़ा हो गया है। डिजाइनर साड़ी विक्रेता महेश झुनझुनवाला, राजकुमार केशरी आदि का कहना है कि कारोबार में ऐसी मंदी पहले नहीं देखी।